पलामू पुलिस के खून की प्यास कब बुझेगी?
कल 15 अगस्त है। आजादी की 79वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी। पलामू पुलिस आज भी जनरल डायर वाली है। बस अंग्रेज चले गए और उसकी जगह स्थानीय सामंतियों ने ले लिया है।
पिछले एक वर्ष में 3 कस्टोडियल डेथ पलामू के थाने में हुए हैं। और सैकड़ों लोगों के साथ थाने में पिटाई, टॉर्चर की घटना हुई है। एसपी रिश्मा रमेशन के कार्यकाल में ये घटनाएं और बढ़ी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने डीके बसु केस में गाइडलाइंस जारी की है। पर शायद यहां के दरोगा से लेकर एस पी तक को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से कोई मतलब नहीं है। इनका अपना गुंडाराज है।
इसीलिए यह सवाल पलामू के पुलिस और जिला प्रशासन से पूछना है कि, कब बुझेगी आपके खून की प्यास?
12 अगस्त को पलामू सिविल कोर्ट के वकील अभिषेक रंजन और सुधांशु बिरंची को मेदिनीनगर शहर थाने में बंद कर, पुलिस अधिकारी शशि रंजन तिवारी द्वारा, जान से मारने की कोशिश की गई। अगर इंकलाबी नौजवान सभा नेता दिव्या भगत, भाकपा माले के लोग नहीं पहुंचते तो, शायद एक और कस्टोडियल डेथ को लेकर हमलोग प्रदर्शन कर रहे होते।
पलामू पुलिस की मानसिकता संघी गुंडों वाली मानसिकता है। दरोगा से लेकर एसपी तक के सभी अधिकारियों की मानसिक स्थिति की जांच होनी चाहिए।
जब तक शशि रंजन तिवारी को बर्खास्त और सभी अधिकारियों के लिए मासिक तौर पर मानसिक मूल्यांकन अनिवार्य नहीं बना दिया जाता है तब तक इंकलाबी नौजवान सभा, जनरल डायर जैसी पुलिस के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ती रहेगी।

