पलामू के दिवंगत चित्रकार नय्यर साहब की स्मृति में चित्रकला प्रदर्शनी, पोस्टर का लोकार्पण
पलामू की कला-साधना के अमर हस्ताक्षर ,नय्यर साहब’ को सलाम — उनकी स्मृति में चित्रकला प्रदर्शनी का पोस्टर लोकार्पित
मेदिनीनगर | पलामू
पलामू प्रमंडल की धरती ने साहित्य, कला, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में अनेक अनमोल रत्नों को जन्म दिया है। इन्हीं अनमोल रत्नों में एक नाम दिवंगत चित्रकार नय्यर साहब का भी है, जिनकी कला-साधना आज भी उनके चाहने वालों और उनके शिष्यों के बीच जीवंत है।
गत वर्ष नय्यर साहब के इंतकाल के बाद उनकी स्मृतियों को जीवंत रखने और उनकी कला को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से मासूम आर्ट ग्रुप द्वारा वरिष्ठ रंगकर्मी एवं पत्रकार छायाकार सैकत चटर्जी जी के आयोजन में चित्रकला प्रदर्शनी आयोजित की जा रही है। इसी क्रम में प्रदर्शनी से संबंधित पोस्टर का लोकार्पण नय्यर साहब के आवास पर उनके परिवार के सदस्यों—पत्नी, भाई एवं पुत्र की गरिमामयी उपस्थिति में करने का अवसर मिला।
नय्यर साहब केवल चित्र बनाने वाले कलाकार नहीं थे, वे रंगों के जादूगर थे। उनके बनाए चित्रों में जीवन बोलता था, भावनाएं दिखाई देती थीं और प्रकृति अपनी पूरी संवेदना के साथ उतर आती थी। उनके चित्रों को देखकर सचमुच आंखें ठहर जाती थीं।
पलामू की धरती ने अनेक हीरे पैदा किए हैं और उन हीरों में नय्यर साहब का अपना एक विशिष्ट स्थान था। उनके द्वारा कला की शिक्षा प्राप्त करने वाले लगभग 30 हजार विद्यार्थियों का उल्लेख उनके कला-सफर की व्यापकता को बताता है। उनके शिष्य आज देश-समाज के विभिन्न हिस्सों में उनकी कला की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
इस अवसर पर मैंने कहा कि नय्यर साहब की स्मृति में उनकी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए और उनकी अधूरी एवं अप्रकाशित पुस्तकों को प्रकाशित कराया जाना चाहिए। यही उस महान कलाकार के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
किसी व्यक्ति के दुनिया से चले जाने के बाद उसकी वास्तविक विरासत सामने आती है। समय गुजरने के साथ नई पीढ़ियां उसके जीवन, संघर्ष और सृजन पर शोध करती हैं। नय्यर साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व को भी इसी दृष्टि से संरक्षित करने की आवश्यकता है।
उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियों में आज भी नजर साहब जीवित हैं। उनकी कला, उनके शिष्य और उनके द्वारा छोड़ी गई रचनात्मक विरासत पलामू की सांस्कृतिक धरोहर है।
इसी धरोहर को सम्मान देने के लिए आयोजित इस चित्रकला प्रदर्शनी में मैं सभी चित्रकारों, रंगकर्मियों, साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों, नौजवानों, छात्र-छात्राओं, मजदूर-किसानों एवं कला-प्रेमियों से आग्रह करता हूं कि बड़ी संख्या में पहुंचकर इस आयोजन का हिस्सा बनें और नय्यर साहब की कला-साधना को श्रद्धापूर्वक नमन करें।
नय्यर साहब शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कला आज भी बोलती है।
उनकी तूलिका थम गई, मगर रंगों की वह भाषा आज भी जीवित है।

