मॉडर्न पब्लिक स्कूल में बाल सुरक्षा पर कार्यशाला, शिक्षकों ने दोहराई प्रतिबद्धता

मॉडर्न पब्लिक स्कूल, झुमरीतेलैया में POCSO एक्ट पर कार्यशाला का आयोजन; बच्चों की सुरक्षा और काउंसिलिंग पर दी गई विस्तृत जानकारी
झुमरीतेलैया, कोडरमा (19 जून 2026, शुक्रवार): मॉडर्न पब्लिक स्कूल में आज शिक्षकों के लिए ‘पॉक्सो (POCSO) एक्ट और बाल सुरक्षा’ पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला के मुख्य वक्ता विद्यालय के प्राचार्य गुरु चरण वर्मा थे, जिन्होंने शिक्षकों का ज्ञानवर्धन करते हुए पॉक्सो कानून की बारीकियों, इसके तहत मिलने वाले कड़े दंड और पीड़ित बच्चों की काउंसिलिंग के तरीकों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए प्राचार्य गुरु चरण वर्मा ने बताया कि POCSO का पूरा नाम प्रिवेंशन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (Prevention of Children from Sexual Offences Act) है। यह कानून लड़कियों के साथ-साथ लड़कों (सभी बच्चों) को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। उन्होंने इसके तहत मिलने वाले कड़े कानूनी दंड की जानकारी देते हुए बताया:

  1. गंभीर अपराधों में आजीवन कारावास या मृत्युदंड: बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न (Aggravated Penetrative Sexual Assault) के मामलों में दोषी को कम से कम 20 वर्ष के कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक की सजा का प्रावधान है।
  2. यौन उत्पीड़न पर न्यूनतम सजा: यौन उत्पीड़न (Sexual Assault) के सामान्य मामलों में भी न्यूनतम 5 से 7 वर्ष तक के कड़े कारावास की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
  3. अपराध छिपाने या रिपोर्ट न करने पर भी सजा: यदि किसी जिम्मेदार व्यक्ति (जैसे शिक्षक या संस्थान) को अपराध की जानकारी होने के बाद भी वह इसकी रिपोर्ट नहीं करता, तो उसे भी कानूनन 1 वर्ष तक की कैद या जुर्माना (या दोनों) हो सकता है।

प्राचार्य ने बताया कि सेक्सुअल एब्यूज (यौन शोषण) के कारण बच्चे गंभीर मानसिक तनाव से गुजरते हैं। यदि किसी बच्चे में निम्नलिखित लक्षण दिखाई दें, तो शिक्षकों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए:

  1. अचानक अकेले रहने की आदत या गुमसुम हो जाना।
  2. शरीर को पूरी तरह ढकने के लिए एक के ऊपर दो-तीन कपड़े पहनना।
  3. दोस्तों, परिवार और रिश्तेदारों से दूरी बना लेना।
  4. किसी खास व्यक्ति को देखकर अचानक डर जाना या सहम जाना।

“बच्चे डर के कारण खुद आगे आकर नहीं बोलते। शिक्षकों को उन्हें सुरक्षित और सहज महसूस कराकर (Comfortable Zone देकर) बात करनी चाहिए। बच्चों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है; डरना और शर्मिंदा होना उस अपराधी को चाहिए जिसने गलत किया है। अगर हम चुप रहेंगे, तो अपराधी की हिम्मत और बढ़ेगी।”

श्री वर्मा ने यह भी जानकारी दी कि यदि कोई बच्चा सीधे बोलने से डरता है, तो राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा जारी POCSO e-Box का उपयोग किया जा सकता है, जहाँ बच्चे डिजिटल माध्यम या तस्वीरों की मदद से भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

कार्यशाला में एक व्यावहारिक गतिविधि (फन एक्टिविटी) के माध्यम से यह समझाया गया कि कोई भी समस्या अपने आप में बड़ी नहीं होती, बल्कि ‘समाज और परिवार क्या सोचेगा’ इस डर से हम उसे बड़ा बना देते हैं। यही डर दोषियों का हौसला बढ़ाता है। माता-पिता के बाद शिक्षक ही बच्चों के सबसे बड़े संरक्षक (गार्जियन) हैं, इसलिए बच्चों को हर संकट से बचाना एक आदर्श शिक्षक का धर्म है।

विद्यालय की निर्देशिका संगीता शर्मा ने इस कार्यशाला की सराहना करते हुए कहा:
“बाल यौन शोषण आज के समय में एक अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है। यदि शिक्षक बच्चों के साथ एक दोस्त और अभिभावक की तरह पेश आएंगे, तो बच्चे अपनी हर परेशानी साझा कर सकेंगे। इसके बाद शिक्षक, माता-पिता के साथ बेहतर सामंजस्य बिठाकर किसी भी समस्या का सही समाधान निकाल सकते हैं।”

इस कार्यशाला में विद्यालय के सभी शिक्षक और शिक्षिकाएं उपस्थित थे, जिन्होंने बाल सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।