दीपावली पर फिर बढ़ी मिट्टी के दीयों की मांग, पचंबा के कुम्हारों के चेहरे पर लौटी मुस्कान

गिरिडीह। दीपावली नजदीक आते ही गिरिडीह के पचंबा स्थित कुम्हार टोली, बीबीसी रोड, मोहलीचुवाँ आदि स्थानों में मिट्टी के दीयों की तैयारी अपने चरम पर पहुंच गई है। एक ओर जहां बाजारों में मिट्टी से बने दिए और खिलौनों की दुकानें सज गई है वहीं दूसरी ओर कुम्हारों के घरों के आंगनों में हजारों दीये सूख रहे हैं और कुम्हार परिवार दिन-रात चाक पर दीये, चुकड़ी, खिलौने और कपटी बनाने में जुटे हैं। इनके लिए त्योहार केवल बिक्री का मौका नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कला और रोजी-रोटी को बचाए रखने का सबसे बड़ा अवसर है।
टोली के 50 वर्षीय अशोक कुमार प्रजापति ने बताया कि उनके दादा और पिता भी मिट्टी के बर्तन व दीये बनाते थे। अशोक प्रजापति ने बताया कि वे करीब 15 वर्ष की उम्र से यह काम कर रहे हैं और अब तक लाखों दीये, चुकड़ी, खिलौने व कपटी तैयार कर चुके हैं।
दुकानो पर एक मिट्टी का दीया 70 से 80 पैसे में बिकता है, जबकि मिट्टी के खिलौने 30 से 50 रुपये तक में उपलब्ध हैं। कारीगरों का कहना है कि इतनी कम कीमत के पीछे मिट्टी जुटाने से लेकर उसे तैयार करने, आकार देने, सुखाने और बिक्री तक की कई दिनों की मेहनत छिपी है।
बीते कुछ वर्षों में बाजार में चाइनीज लाइट और रंग-बिरंगी झालरों के चलन ने मिट्टी के दीयों की मांग काफी घटा दी थी। उन्होंने बताया कि चार-पांच साल तक कारोबार बेहद खराब रहा और कई बार रोजी-रोटी के लिए दूसरा काम तलाशने की स्थिति बन गई थी।
दूसरे कारीगरों के अनुसार, सस्ती बिजली की सजावट ने पारंपरिक दीयों के कारोबार को नुकसान जरूर पहुंचाया, लेकिन इस परंपरा को खत्म नहीं कर सकी। अब ग्राहक फिर से मिट्टी के दीये खरीदने दुकानों पर पहुंच रहे हैं, जिससे कारीगरों के चेहरे पर उम्मीद लौटी है।
दीपावली पर दीये जलाने की परंपरा प्रकाश, शुभता और समृद्धि की कामना से जुड़ी मानी जाती है। इसीलिए आधुनिक सजावट के बढ़ते चलन के बावजूद मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है।
पचंबा की कुम्हार टोली में इस बार बढ़ती मांग ने कारीगरों को राहत दी है। उनके लिए हर बिकता दीया केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि पुरखों की विरासत और हुनर को आगे बढ़ाने का भरोसा भी है। कुम्हारों को उम्मीद है कि इस दीपावली मिट्टी के दीयों की रोशनी उनके घरों में भी खुशहाली लेकर आएगी।