दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिसिया कार्रवाई को लेकर कांग्रेस का हमला, अमित शाह से मांगा जवाब: अभिजीत कमल

जंतर-मंतर और दिल्ली की सड़कों पर लोकतंत्र का गला घोंटने की कोशिश! बेटियों पर हमला करने वालों को संरक्षण क्यों? अमित शाह जवाब दें!

धारा 163 के पीछे छिपकर नागरिक अधिकारों का दमन नहीं चलेगा; महिलाओं पर हमले, कथित गुंडागर्दी और सामूहिक हिरासत की निष्पक्ष जांच हो।

अभिजीत कमल, प्रदेश प्रतिनिधि, झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी का बयान

10 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची संशोधन यानी SIR को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बीच प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए जिस तरह व्यापक पुलिस बंदोबस्त, हिरासत और आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए गए, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रदर्शन से जुड़े वायरल वीडियो में छात्रों और महिलाओं के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया है। द इंडियन एक्सप्रेस की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, डीडीयू मार्ग पर हुई इस घटना के सिलसिले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। अब सवाल यह है कि महिलाओं और छात्रों पर हमला करने की नौबत आई ही क्यों और क्या सभी दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होगी?

यदि किसी भी व्यक्ति ने महिलाओं के कपड़े खींचे, उनके साथ अभद्रता की या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमला किया, तो यह किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है। ऐसे कृत्यों को किसी राजनीतिक विचारधारा, संगठन या बहुसंख्यकवाद के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

धारा 163 कानून-व्यवस्था का प्रावधान है, मनमानी का लाइसेंस नहीं!

दिल्ली पुलिस द्वारा निषेधाज्ञा और प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने का हवाला दिया गया। लेकिन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 का इस्तेमाल संविधान से ऊपर उठकर नागरिकों के अधिकार समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।

संविधान का अनुच्छेद 19 शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन अधिकारों पर कानून के अनुसार प्रतिबंध संभव हैं, लेकिन हर कार्रवाई आवश्यक, वैध और आनुपातिक होनी चाहिए।

प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने का अर्थ यह नहीं है कि किसी नागरिक के साथ मारपीट की जा सकती है, महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ किया जा सकता है या बिना वैध आधार के किसी को हिरासत में लिया जा सकता है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली पुलिस से सात सीधे सवाल

  1. बेटियों के कपड़े खींचने और महिलाओं पर कथित हमले के आरोपों पर जवाब कौन देगा? क्या वायरल वीडियो में दिखाई देने वाली घटनाओं की निष्पक्ष जांच कर प्रत्येक आरोपी की पहचान की जाएगी? महिलाओं की गरिमा पर हमला करने वालों को राजनीतिक संरक्षण तो नहीं दिया जा रहा?
  2. चार गिरफ्तारियां होने के बाद क्या पूरी सच्चाई सामने आ गई? डीडीयू मार्ग की घटना में चार लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई है। क्या जांच में शामिल सभी लोगों की पहचान होगी और पीड़ितों को न्याय मिलेगा?
  3. दिल्ली में हजारों लोगों को हिरासत में लेने का आधार क्या था? क्या प्रत्येक व्यक्ति के मामले में कानूनी आधार, हिरासत की अवधि और उसके परिजनों या वकील से संपर्क के अधिकार का पालन किया गया? यदि किसी को अवैध रूप से रोका गया, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
  4. क्या धारा 163 संविधान से ऊपर है? यदि नहीं, तो प्रदर्शन रोकने के लिए लगाए गए प्रतिबंधों की आवश्यकता, दायरा और आनुपातिकता सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं की जाती?
  5. क्या असहमति जताने वाले नागरिक अब सरकार की नजर में अपराधी हैं? मतदाता सूची, निर्वाचन प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। इन सवालों का जवाब देने के बजाय प्रदर्शनकारियों को रोकना किस लोकतांत्रिक परंपरा का परिचायक है?
  6. महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफलता के लिए जवाबदेही कब तय होगी? 3 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर एक अलग प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिसकर्मियों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 8 अक्टूबर को इस मामले में दिल्ली पुलिस आयुक्त से दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी। क्या इन गंभीर शिकायतों की जांच समयबद्ध ढंग से पूरी होगी?
  7. क्या गृह मंत्रालय सार्वजनिक रूप से जवाब देगा कि प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए? क्या सरकार हिरासत, पुलिस कार्रवाई, कथित हमलों और शिकायतों की स्थिति पर तथ्यात्मक रिपोर्ट जारी करेगी?

कांग्रेस की स्पष्ट मांगें

  1. 10 अक्टूबर की घटना की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज, वायरल वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पुलिस रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं।
  2. महिलाओं के कपड़े खींचने, अभद्रता करने और छात्रों या अन्य प्रदर्शनकारियों पर हमले के आरोपों की जांच कर साक्ष्यों के आधार पर दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
  3. प्रत्येक हिरासत की वैधता की समीक्षा की जाए। जिन लोगों को हिरासत में रखने का कोई वैध आधार नहीं है, उन्हें तत्काल छोड़ा जाए और सभी को कानूनी सहायता तथा परिजनों से संपर्क का अधिकार मिले।
  4. पुलिस और अन्य अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच हो। किसी भी अधिकारी की अवैध कार्रवाई या कर्तव्य में गंभीर लापरवाही प्रमाणित होने पर उचित कार्रवाई की जाए।
  5. केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पूरी कार्रवाई, हिरासत में लिए गए लोगों की स्थिति और दर्ज शिकायतों पर सार्वजनिक रूप से जवाब दें।

लोकतंत्र किसी पार्टी की जागीर नहीं है

देशभक्ति का प्रमाण सत्ता से सहमत होना नहीं, बल्कि संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, महिलाओं की गरिमा, शांतिपूर्ण विरोध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता।

यदि प्रदर्शनकारियों ने कानून का उल्लंघन किया है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो। लेकिन यदि किसी नागरिक पर हमला हुआ है, किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार हुआ है या किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही अनिवार्य है।

हम स्पष्ट कहना चाहते हैं—धारा 163 का नाम लेकर लोकतंत्र को बंधक नहीं बनाया जा सकता। बेटियों की गरिमा पर हमला करने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए और नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को जवाबदेही से छूट नहीं मिलनी चाहिए।

अमित शाह जवाब दें। दिल्ली पुलिस जवाब दे। केंद्र सरकार जवाब दे। लोकतंत्र में जनता सवाल पूछेगी और सत्ता को जवाब देना होगा।

जारीकर्ता:
अभिजीत कमल
प्रदेश प्रतिनिधि झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी सह वरीय उपाध्यक्ष गढ़वा कांग्रेस कमेटी