1857 के वीर शहीद जय मंगल पांडेय की गुमनाम वीरगाथा, वंशज ने उठाई विरासत बचाने की आवाज

1857 में ही बदल सकती थी आजादी की तस्वीर, चतरा में शहीद हो गए जय मंगल पांडेय

बलिया के मंगल पांडेय को देश जानता है, हजारीबाग के जय मंगल पांडेय की वीरगाथा आज भी पहचान की प्रतीक्षा में

पलामू के राजोगाड़ी से जुड़ा शहीद का पारिवारिक रिश्ता, सातवीं पीढ़ी के वंशज सच्चिदानंद पांडेय ने उठाई विरासत बचाने की आवाज

पलामू/चतरा। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम केवल मेरठ, कानपुर और दिल्ली की कहानी नहीं था। झारखंड की धरती पर भी अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ ऐसी चिंगारी भड़की थी, जिसने ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती दी। इसी संघर्ष के प्रमुख योद्धाओं में सूबेदार जय मंगल पांडेय और सूबेदार नादिर अली का नाम आता है। डोरंडा से निकली क्रांतिकारी टुकड़ी ने चतरा में अंग्रेजी सेना से निर्णायक मुकाबला किया और 4 अक्टूबर 1857 को जय मंगल पांडेय व नादिर अली को फांसी दे दी गई।

लोक स्मृति में आज भी उनकी शहादत की गूंज सुनाई देती है—

सूबेदार* जय मंगल पांडेय, सूबेदार नादिर अली दोनों सूबेदार रे,
फांसी चढ़ले हरजीवन तालाब रे।”*

अंग्रेजी सेना की वर्दी पहनी, फिर उसी सत्ता के खिलाफ उठ खड़े हुए

उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार जय मंगल पांडेय का जन्म 1793 में हजारीबाग के खिरगांव में हुआ था। 1818 में वे ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए और डोरंडा की बटालियन में सूबेदार बने। भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव और अंग्रेजी शासन की नीतियों ने उनके भीतर असंतोष पैदा किया। धीरे-धीरे उन्होंने भारतीय सैनिकों और स्थानीय शक्तियों को जोड़कर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह की जमीन तैयार की।

1857 में डोरंडा से विद्रोही टुकड़ी के निकलने के बाद जय मंगल पांडेय और नादिर अली के नेतृत्व में क्रांतिकारी आगे बढ़े। उनका उद्देश्य बाबू कुंवर सिंह से जुड़कर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को व्यापक रूप देना था। रास्ते में विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारी उनसे जुड़े और यह टुकड़ी चतरा पहुंची।

चतरा की लड़ाई और शहादत

2 अक्टूबर 1857 को चतरा में अंग्रेजी सेना और क्रांतिकारियों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। लड़ाई में दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ। संघर्ष के बाद जय मंगल पांडेय और नादिर अली गिरफ्तार कर लिए गए। 4 अक्टूबर 1857 को दोनों को हरजीवन तालाब के समीप फांसी दी गई। आज यह स्थान फांसी तालाब के नाम से जाना जाता है और उनकी शहादत की स्मृति को संजोए हुए है।

पलामू के राजोगाड़ी से भी जुड़ी है शहीद की विरासत

जय मंगल पांडेय की कहानी का एक महत्वपूर्ण सिरा नीलांबर-पीतांबरपुर के राजोगाड़ी से भी जुड़ा बताया जाता है। शहीद के परिवार से जुड़े लोगों के अनुसार राजोगाड़ी उनका ससुराल था। जय मंगल पांडेय के छठी पीढ़ी के वंशज कमल पांडेय और प्रतिमा पांडेय तथा सातवीं पीढ़ी के वंशज सच्चिदानंद पांडेय बताते हैं कि परिवार की जड़ें राजोगाड़ी से जुड़ी हैं।

परिवार के अनुसार उनके पूर्वज की प्रेरणा से आज भी परिवार सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है। वहीं हजारीबाग के खिरगांव में शहीद परिवार की पैतृक विरासत भी मौजूद है। परिजनों की पीड़ा है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी शहीद परिवार को वह सम्मान और पहचान नहीं मिली, जिसकी वह अपेक्षा करता रहा है।

सरकारी किताब में पहुंची वीरगाथा, लेकिन परिवार तक नहीं पहुंचा सम्मान

लगातार मांग उठाए जाने के बाद झारखंड सरकार की कक्षा आठ की इतिहास की पाठ्यपुस्तक में जय मंगल पांडेय की जीवनी को स्थान दिया गया है। भारत सरकार के स्तर पर भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कार्यक्रमों और सामग्री में जय मंगल पांडेय का उल्लेख किया गया है। यह उनकी शहादत को सार्वजनिक इतिहास में स्थान मिलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

पलामू के इतिहासकार शत्रुहन पांडेय ने भी जय मंगल पांडेय और नादिर अली के जीवन तथा 1857 के संघर्ष पर विस्तृत शोध कर पुस्तक लिखी है। उनके शोध ने इस क्षेत्र के उन क्रांतिकारियों की भूमिका को सामने लाने का प्रयास किया है, जिनका योगदान लंबे समय तक व्यापक चर्चा से दूर रहा।

जयंती समारोह होता है, मगर शहीद परिवार ही उपेक्षित

चतरा में प्रशासनिक स्तर पर जय मंगल पांडेय और नादिर अली की जयंती/शहादत दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन परिजनों का कहना है कि कई अवसरों पर शहीद परिवारों को ही समारोह में आमंत्रित नहीं किया जाता।

शहीद परिवार का कहना है कि प्रशासन को कम से कम सम्मानस्वरूप शहीदों के वंशजों को समारोह में आमंत्रित करना चाहिए। जिस परिवार ने पीढ़ियों तक अपने पूर्वज की स्मृति को जीवित रखा, उसे सरकारी कार्यक्रम से दूर रखना सम्मान की भावना पर सवाल खड़ा करता है।

अब सिर्फ पुष्पांजलि नहीं, ठोस पहल की जरूरत

जय मंगल पांडेय के वंशज सच्चिदानंद पांडेय की मांग है कि सरकार और प्रशासन शहीद की विरासत को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए। खिरगांव, डोरंडा, चतरा और पलामू के राजोगाड़ी से जुड़ी ऐतिहासिक कड़ियों का प्रमाणिक दस्तावेजीकरण कराया जाए। चतरा के फांसी तालाब का संरक्षण और विकास हो तथा शहीद परिवारों को सरकारी समारोहों में सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाए।

4 अक्टूबर को जब चतरा की धरती पर जय मंगल पांडेय और नादिर अली को याद किया जाएगा, तब सवाल सिर्फ श्रद्धांजलि देने का नहीं होगा। सवाल यह भी होगा कि क्या शहीदों की विरासत को केवल मंच और माल्यार्पण तक सीमित रखा जाएगा या उनके परिवार, इतिहास और शहादत स्थल को वह सम्मान मिलेगा, जिसके वे अधिकारी हैं?

बलिया के मंगल पांडेय और हजारीबाग के जय मंगल पांडेय अलग-अलग क्रांतिकारी थे। एक का नाम राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन गया, दूसरे की वीरगाथा को सामने लाने की जिम्मेदारी आज उनकी सातवीं पीढ़ी संभाल रही है। अब समय है कि जय मंगल पांडेय की शहादत को केवल इतिहास की किताब में नहीं, बल्कि शासन की नीतियों, स्मारक और जनस्मृति में भी सम्मान जनक स्थान मिले।