पहले पुलिस अपने चाल, चरित्र और चिंतन में सुधार करे, फिर जनप्रतिनिधियों से आचरण की अपेक्षा रखे’

पहले पुलिस चाल, चरित्र व चिंतन में सुधार करे,फिर विधायक जयराम जैसे जनप्रतिनिधि: झारखण्ड क्रांति मंच/एम०के०के०यू०

झारखण्ड क्रांति मंच के केन्द्रीय अध्यक्ष सह मजदूर किसान कामगार यूनियन झारखण्ड के सचिव सह प्रवक्ता शत्रुघ्न कुमार शत्रु,एम०के०के०यू० के केन्द्रीय अध्यक्ष सह जेके एम उपाध्यक्ष गिरिजा प्रसाद विश्वकर्मा,जेके एम के केन्द्रीय सचिव सह कार्यालय प्रभारी विजय राम व मजदूर किसान कामगार यूनियन के केन्द्रीय कार्यालय सचिव नारायण सत्यार्थी ने मेदिनीनगर में संयुक्त प्रेस बयान जारी कर कहा है कि पहले पुलिस प्रशासन को अपने चाल, चरित्र व चिंतन में सुधार कर पब्लिक फ्रैंडली बनने की जरूरत है,इसके बाद विधायक जयराम महतो जैसे जनप्रतिनिधियों से आदर्श आचार संहिता के अनुरूप आचरण की अपेक्षा रखनी चाहिए।
जारी बयान में जेके एम के केन्द्रीय अध्यक्ष ने कहा है कि निश्चित प्रतियोगिता परीक्षाओं को पास कर पुरुषार्थ,लिप्सा रहित व स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा भावना का शपथ लेने वाले थाना प्रभारियों से लेकर बहुत सारे आइपीएस अधिकारियों की निकृष्ट भाषा शैली व कार्य शैली का कई वीडियोज आज भी सोशल मीडिया पर वायरल है। फ़रवरी 2002 में पाटन थाने के तत्कालीन जातिवादी थाना प्रभारी दिनेश राणा व इंस्पेक्टर बी० के० चतुर्वेदी ने पुलिसकर्मियों के साथ नशे में चूर होकर तत्कालीन दलित विरोधी पलामू एसपी अनिल पाल्टा व तत्कालीन विधायक व वर्तमान समझौतावादी वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के इशारे पर तत्कालीन बी०डी०ओ० अर्चना मेहता व उसके भ्रष्ट सी०ओ० पति अखिलेश चन्द्र सिन्हा के झूठे आरोपों को आधार बनाकर मेरे साथ रातभर जातिसूचक व मेरी मां-बहन से सम्बंधित गाली-गलौज करते हुए बर्बरतम व अमानवीय पिटाई कर मरन्नासन अवस्था में पहूंचा दिया था,जिसके चलते मैं आंशिक विकलांगता का शिकार हो गया हूं।उस वक्त मैं कोई माओवादी व कथित आतंकवादी संगठन का सदस्य नहीं बल्कि बहुजन समाज पार्टी का जिलाध्यक्ष था।उस वक्त हमारी व्यथा को ना तो नरपिशाच थाना प्रभारी राणा ने समझा और ना ही पंजाब से आनेवाला कथित दलित समाज का निकृष्ट व बेइमान आइपीएस अनिल पाल्टा ने समझने की कोशिश की?
आज किशोर व पाल्टा जैसे नकली दलित सत्ता की कुंडली में बैठ कर मलाई चाट रहे हैं।किशोर के मंत्री बनने के बाद पाल्टा अब डीजीपी बनने की ओर अग्रसर हैं।बड़ा सवाल यह है कि साधारण पुलिस से लेकर आइपीएस तक सत्ता के अनुचित इशारे पर कुत्ता क्यों बन जाते हैं?
संविधान के अनुसार जो रक्षक है,वहीं अच्छी पोस्टिंग व घूस कमाने के चक्कर में भक्षक बनकर वर्दी की मर्यादा का रुदन शुरू कर दें,तो क्या उसके कार्यों की समीक्षा नहीं होगी?
संयुक्त प्रेस बयान में नेताओं ने कहा है कि 60 वर्षों के लिए चयनित पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही 5 वर्षों के लिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से ज्यादा है, क्योंकि इन्हें जनता तो पांच वर्षों बाद सबक सिखा देती है, लेकिन भ्रष्ट व आचरण हीन अधिकारी घूस लेते पकड़े जाने के बाद भी फिर से पदस्थापित होकर वहीं तांडव मचाते हैं।