क्या इतिहास बनकर रह जाएगी गढ़वा की सरस्वती नदी?
क्या इतिहास बनकर रह जाएगी गढ़वा की सरस्वती नदी?
“नदी केवल जलधारा नहीं होती, वह सभ्यता की आत्मा होती है।”
जब कोई नदी बहती है, तो उसके साथ संस्कृति बहती है, जीवन बहता है, प्रकृति मुस्कुराती है और समाज जीवंत रहता है। किंतु जब वही नदी मानव की संवेदनहीनता, अतिक्रमण, प्रदूषण और उपेक्षा के कारण दम तोड़ने लगे, तब यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के पतन का संकेत बन जाता है।
कहा जाता है कि संपूर्ण विश्व में केवल दो ही सरस्वती नदियाँ हैं। एक, जो प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में विलीन हो चुकी है और दूसरी झारखंड प्रांत के गढ़वा जिले में प्रवाहित होने वाली पावन सरस्वती नदी। यह नदी कभी सदानीरा हुआ करती थी। इसके निर्मल जल से आसपास का जीवन समृद्ध होता था। लोगों की आस्था, संस्कृति और दैनिक जीवन इस नदी से जुड़ा हुआ था। किंतु आज वही सरस्वती नदी अपने अस्तित्व की अंतिम साँसें गिनती प्रतीत हो रही है।
गढ़वा की यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर आज मानवीय उदासीनता की शिकार है। नदी के किनारों पर बढ़ते अतिक्रमण, गंदगी का अंबार, जलस्रोतों का अवरुद्ध होना तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति घटती संवेदनशीलता ने इस नदी को धीरे-धीरे मृत्यु के कगार पर पहुँचा दिया है। विडंबना यह है कि जिस नदी ने पीढ़ियों को जीवन दिया, आज वही जीवन की भीख माँगती दिखाई दे रही है।
कहीं-कहीं किसी नदी को किसी प्रदेश का “शोक” कहा जाता है, किंतु जब किसी नदी का शोक स्वयं मनुष्य बन जाए, तब उसे क्या संज्ञा दी जाए? क्या इसे विकास के नाम पर विनाश कहा जाए? या फिर यह हमारी सामूहिक असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है?
आज आवश्यकता केवल चिंता व्यक्त करने की नहीं, बल्कि ठोस पहल करने की है। समाज के जागरूक नागरिक, स्वयंसेवी संगठन, मानवाधिकार संस्थाएँ, पर्यावरणविद्, प्रशासनिक अधिकारी तथा जनप्रतिनिधि यदि ईमानदारी से एक मंच पर आएँ, तो सरस्वती नदी का पुनर्जीवन असंभव नहीं है। देश में अनेक नदियाँ जनसहभागिता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बल पर पुनर्जीवित की जा चुकी हैं। गढ़वा की सरस्वती नदी भी पुनः अपनी निर्मल धारा के साथ बह सकती है, बशर्ते समाज समय रहते जाग जाए।
इस संदर्भ में अभिषेक भारद्वाज जी का प्रयास अत्यंत सराहनीय है। वे पूरी दृढ़ता और समर्पण के साथ लोगों से सरस्वती नदी को बचाने की अपील कर रहे हैं। उनका यह अभियान केवल एक व्यक्ति का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे समाज को झकझोरने वाली पुकार है। ऐसे प्रयासों को व्यापक जनसमर्थन मिलना चाहिए, क्योंकि परिवर्तन की शुरुआत अक्सर एक आवाज़ से ही होती है।
अब प्रश्न यह है कि इतने सारे संगठनों, बुद्धिजीवियों और जिम्मेदार लोगों के रहते हुए भी आखिर धरातल पर कार्य का शुभारंभ कब होगा? क्या हम केवल चर्चा, भाषण और सोशल मीडिया तक ही सीमित रह जाएँगे? या फिर आने वाली पीढ़ियों के लिए इस नदी को बचाने का संकल्प लेंगे?
यदि आज भी हम नहीं जागे, तो संभव है कि आने वाले समय में गढ़वा की यह सरस्वती नदी केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाए। तब आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह प्रश्न अवश्य पूछेंगी कि जब नदी मर रही थी, तब हम क्या कर रहे थे?
समय अभी भी हाथ में है। आवश्यकता है सामूहिक चेतना, जनभागीदारी और दृढ़ संकल्प की। क्योंकि यदि नदियाँ बचेंगी, तभी प्रकृति बचेगी; और यदि प्रकृति बचेगी, तभी मानव सभ्यता सुरक्षित रह पाएगी।
नीरज श्रीधर स्वर्गीय
प्रांतीय कला धरोहर संयोजक
संस्कार भारती झारखंड प्रांत
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निदेशक
पं. हर्ष द्विवेदी कला मंच
नवादा, गढ़वा (झारखंड)


