JTET 2026 में भाषा विवाद गहराया, मगही-भोजपुरी को शामिल करने की मांग तेज

पलामू: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) 2026 की नई अधिसूचना को लेकर एक बार फिर भाषाई विवाद गहरा गया है। राष्ट्रीय चेरो जनजातीय महासंघ झारखंड प्रदेश ने पलामू उपायुक्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नाम ज्ञापन सौंपकर JTET 2026 की नई नियमावली में मगही, भोजपुरी और अंगिका भाषाओं को तुरंत शामिल करने की मांग की है। साथ ही पलामू, लातेहार और गढ़वा जिलों में कुडूख (कुरुख) व नागपुरी भाषाओं को अनिवार्य रूप से लागू करने का विरोध भी दर्ज किया गया है।
महासंघ का कहना है कि भाषा का कोई विरोध नहीं है, लेकिन किसी भी भाषा को जबरन अनिवार्य बनाना स्थानीय संस्कृति, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य के साथ अन्याय है। ज्ञापन सौंपने के बाद महासंघ के पदाधिकारियों ने स्पष्ट कहा, “हम किसी भाषा के विरोधी नहीं हैं। कुडूख और नागपुरी दोनों ही समृद्ध भाषाएं हैं, लेकिन पलामू प्रमंडल के इन तीन जिलों में जहां 95 प्रतिशत से अधिक आबादी मगही, भोजपुरी और अंगिका बोलती है, वहां इन दो भाषाओं को अनिवार्य कर देना छात्रों, अभ्यर्थियों और शिक्षकों के हित में बिल्कुल सही नहीं है।”
ज्ञापन सौंपने की पूरी घटना
मंगलवार को पलामू जिला मुख्यालय दुमका रोड स्थित उपायुक्त कार्यालय में राष्ट्रीय चेरो जनजातीय महासंघ झारखंड प्रदेश की एक बड़ी टीम पहुंची। टीम में महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष, जिला पदाधिकारी, चेरो समाज के बुजुर्ग और स्थानीय युवा नेता शामिल थे। उन्होंने उपायुक्त को मुख्यमंत्री के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में JTET 2026 की नई अधिसूचना का जिक्र करते हुए कहा गया कि मार्च 2026 में जारी नई नियमावली में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से मगही, भोजपुरी और अंगिका को हटा दिया गया है, जबकि इन तीनों जिलों में ये भाषाएं लोकभाषा के रूप में प्रचलित हैं।
महासंघ ने मांग की कि:
JTET 2026 की क्षेत्रीय/जनजातीय भाषा सूची में मगही, भोजपुरी और अंगिका को तुरंत शामिल किया जाए।
पलामू, लातेहार और गढ़वा में कुडूख व नागपुरी को अनिवार्य न बनाया जाए, बल्कि वैकल्पिक विकल्प के रूप में रखा जाए।
स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता देते हुए शिक्षक भर्ती में मातृभाषा आधारित शिक्षा नीति का पालन किया जाए।
क्यों उठा विवाद?
JTET 2026 की नई अधिसूचना (मार्च 2026) में झारखंड सरकार ने क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में बड़ा बदलाव किया। पहले की सूची में शामिल मगही, भोजपुरी, अंगिका और मैथिली जैसी भाषाओं को हटा दिया गया। इसके बजाय पलामू, गढ़वा और लातेहार जिलों के लिए नागपुरी और कुडूख को क्षेत्रीय भाषा के रूप में चुना गया। सरकार का तर्क था कि ये जनजातीय भाषाएं हैं और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में इन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
लेकिन स्थानीय स्तर पर तीखा विरोध शुरू हो गया। चेरो जनजातीय महासंघ ने इसे “सौतेला व्यवहार” करार दिया। महासंघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने ज्ञापन के बाद कहा, “पलामू प्रमंडल चेरो, खरवार और अन्य समुदायों का गढ़ रहा है। यहां की लोकभाषा मगही-भोजपुरी है। नागपुरी तो मुख्यतः रांची-खूंटी क्षेत्र में बोली जाती है, जबकि कुडूख उरांव समुदाय की भाषा है। इन तीन जिलों में इन भाषाओं का प्रचलन बहुत कम है। अनिवार्यता से हजारों अभ्यर्थी प्रभावित होंगे। प्राथमिक शिक्षा में बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़ना चाहते हैं, न कि जबरन थोपी गई भाषा में।”
स्थानीय असर और युवाओं की चिंता
पालामू, लातेहार और गढ़वा में JTET की तैयारी कर रहे हजारों युवा इस फैसले से निराश हैं। कई अभ्यर्थियों का कहना है कि अगर नागपुरी और कुडूख अनिवार्य हो गए तो वे परीक्षा में बैठने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि इन भाषाओं का स्कूल स्तर पर पढ़ाई नहीं होती। वहीं, पहले से कार्यरत शिक्षक भी नई नियमावली से परेशान हैं।
महासंघ ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने ज्ञापन पर तुरंत संज्ञान नहीं लिया और नियमावली में संशोधन नहीं किया तो पूरे पलामू प्रमंडल में आंदोलन शुरू किया जाएगा। संगठन ने कहा, “हम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से अपील करते हैं कि वे झारखंड की सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखें। भाषा विवाद को बढ़ावा न दें।”
JTET 2026 का बड़ा संदर्भ
झारखंड में JTET 2026 की आवेदन प्रक्रिया 21 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाली है। नई अधिसूचना में कई बदलाव किए गए हैं, जिनमें भाषा नीति सबसे विवादास्पद साबित हो रही है। इससे पहले भी 2025 में इसी तरह का विवाद हुआ था, लेकिन सरकार ने 2026 में फिर वही गलती दोहराई। विभिन्न राजनीतिक दलों (राजद, कांग्रेस, भाजपा) और सामाजिक संगठनों ने पहले ही मुख्यमंत्री से पुनर्विचार की मांग की है। अब चेरो जनजातीय महासंघ का ज्ञापन इस विवाद को और तीखा बना रहा है।