नवरात्रि की सप्तमी पर मां कालरात्रि की पूजा, गुड़ का भोग और नीला रंग माना जाता है शुभ
गिरिडीह। शारदीय नवरात्रि के आज सातवें दिन शनिवार (17 अक्तूबर) को मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की विधिपूर्वक आराधना की जाती है। उग्र स्वरूप की होने के बावजूद देवी को भक्तों के कल्याणकारी और ‘शुभंकरी’ माना जाता है। मान्यता है कि उनकी उपासना से भय, नकारात्मक शक्तियों और जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि 17 अक्तूबर को प्रातः 5 बजकर 54 मिनट से प्रारंभ होकर 18 अक्तूबर को प्रातः 8 बजकर 28 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि होने के कारण मां कालरात्रि का पूजन 17 और 18 अक्तूबर दोनों दिन किया जा सकता है।
पूजा विधि
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर घी का दीपक जलाएं।
देवी को रोली, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें।
मंत्रों का जाप करें, भोग लगाएं और अंत में आरती कर परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
धार्मिक मान्यताओं में मां कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय माना गया है। इस दिन गुड़, गुड़ का हलवा, गुड़ की खीर या मालपुआ का भोग लगाया जा सकता है। पूजा के बाद प्रसाद परिवार में बांटना शुभ माना जाता है।
इस अवसर पर नीला रंग पहनना शुभ माना जाता है, जिसे शक्ति, स्थिरता और सकारात्मकता का प्रतीक बताया जाता है। चमेली के फूल अर्पित करने की परंपरा भी है; श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अनुसार गुड़हल या अन्य सुगंधित पुष्प भी चढ़ा सकते हैं।
मां कालरात्रि का बीज मंत्र “ॐ देवी कालरात्र्यै नमः” है। भक्त इसका जाप कर देवी से साहस, सद्बुद्धि और संकटों से रक्षा की कामना करते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार राक्षस रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की प्रत्येक बूंद से नया दैत्य उत्पन्न हो जाएगा। देवी दुर्गा ने रक्तबीज के संहार हेतु कालरात्रि स्वरूप धारण किया और रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही ग्रहण कर असुर का वध किया। इससे देवताओं को संकट से मुक्ति मिली और धर्म की विजय हुई।
मां कालरात्रि की पूजा बुराई पर विजय, साहस और आत्मबल का संदेश देती है। नवरात्रि के सातवें दिन भक्त देवी की उपासना कर जीवन से भय व नकारात्मकता दूर करने तथा सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

