लोककला का वास्तविक स्वरूप व्यापक और गौरवशाली : निरंजन पंडा

लोककला का वास्तविक स्वरूप व्यापक और गौरवशाली : निरंजन पंडा

कला एवं साहित्य की अखिल भारतीय संस्था संस्कार भारती के तत्वावधान में “लोककला : एक परिचय” विषयक एक भव्य एवं गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन ज्ञान निकेतन कॉन्वेंट स्कूल, पुरानी बाजार, गढ़वा में संपन्न हुआ। इस अवसर पर अखिल भारतीय लोक कला संयोजक निरंजन पंडा जी का प्रेरणादायी उद्बोधन कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा, जिसमें उन्होंने लोककला के वास्तविक स्वरूप, उसके महत्व और उसके दार्शनिक आधार को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक रीति से हुआ, जिसके पश्चात उपस्थित अतिथियों का स्वागत किया गया। इस आयोजन में विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े गणमान्य व्यक्तियों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिससे कार्यक्रम का वातावरण अत्यंत प्रेरणादायक और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण हो गया। उपस्थित जनों में कला एवं संस्कृति के प्रति गहरी आस्था और जुड़ाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ।
अपने उद्बोधन में निरंजन पंडा जी ने लोककला की मूल अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि लोककला का अस्तित्व सृष्टि के प्रारंभ से ही रहा है। यह केवल किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानव सभ्यता की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि लोककला जीवन के प्रत्येक आयाम—सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक—से जुड़ी हुई है और यह हमारे पूर्वजों की चेतना, अनुभव और संवेदनाओं का जीवंत प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है।
निरंजन पंडा जी ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि लोककला को प्रायः अंग्रेज़ी में “फोक आर्ट” कहकर संबोधित किया जाता है, जो भारतीय दृष्टिकोण से उचित नहीं है। उन्होंने बताया कि “फोक” शब्द जर्मन भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ उपेक्षित या निम्न स्तर से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस प्रकार लोककला को “फोक आर्ट” कहना उसकी गरिमा और व्यापकता को सीमित करने जैसा है। उन्होंने कहा कि यह शब्द हमारी सांस्कृतिक परंपरा के साथ न्याय नहीं करता और हमें अपनी भाषा और परिभाषाओं के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है।
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय वाङ्मय और परंपरा में “लोक” शब्द अत्यंत व्यापक और उच्च अर्थों में प्रयुक्त होता है। “लोक” केवल जनसामान्य तक सीमित नहीं, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे शास्त्रों में विष्णु लोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, मृत्युलोक आदि शब्दों का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि “लोक” का अर्थ अत्यंत व्यापक और दिव्य है। इस दृष्टि से लोककला भी उतनी ही व्यापक, गहन और सम्माननीय है।
निरंजन पंडा जी ने कहा कि लोककला हमारे जीवन का अभिन्न अंग है, जो हमारी परंपराओं, रीति-रिवाजों, उत्सवों और जीवनशैली में रची-बसी है। यह न केवल अतीत की धरोहर है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि लोककला के संरक्षण और संवर्धन के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को आगे आना चाहिए, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सके और आने वाली पीढ़ियाँ इससे प्रेरणा प्राप्त कर सकें।
कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से आए अतिथियों एवं कलाकारों की सक्रिय भागीदारी ने आयोजन को और भी प्रभावशाली बना दिया। ओडिसी नृत्य की प्रशिक्षिकाओं तथा तबला वादिका की उपस्थिति ने कार्यक्रम में कला के विविध आयामों को साकार रूप में प्रस्तुत किया। साथ ही, संस्कार भारती छत्तीसगढ़ प्रांत के प्रांतीय संगीत विधा संयोजक पवन पाण्डेय, संस्कार भारती गढ़वा जिला इकाई के अध्यक्ष मदन प्रसाद केशरी, पलामू विभाग प्रमुख डॉ. शंभू कुमार तिवारी, अखिल भारतीय साहित्य परिषद् गढ़वा जिला इकाई के सचिव प्रमोद कुमार, एकल अभियान के गढ़वा जिला संयोजक सियाराम शरण वर्मा, अखिल विश्व गायत्री परिवार के गढ़वा जिला संयोजक विनोद कुमार पाठक, अधिवक्ता परिषद गढ़वा जिला के राजीव रंजन तिवारी, भारतीय जनता पार्टी के डॉक्टर पातंजलि कुमार केशरी, संस्कार भारती गढ़वा जिला इकाई के कार्यक्रम संयोजक दयाशंकर गुप्त, कवि राजमणि राज, पर्यावरण परिवार गढ़वा के सचिव नितिन तिवारी, डीडी न्यूज़ गढ़वा के संवाददाता विजेंद्र तिवारी, गीतांश टीवी के निदेशक प्रदीप कुमार, कवि नीरज मल्लिक, शिक्षकद्वय योगेंद्र कुमार व मार्कंडेय तिवारी सहित ओडिसी नृत्य की प्रशिक्षिकाएँ और तबला वादिका आदि की सहभागिता ने इस आयोजन को एक व्यापक सामाजिक एवं सांस्कृतिक मंच का रूप प्रदान किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन संस्कार भारती के झारखंड प्रांत के कला धरोहर संयोजक नीरज श्रीधर ‘स्वर्गीय’ द्वारा किया गया, जिन्होंने पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित और सारगर्भित रूप से आगे बढ़ाया। अंत में सभी उपस्थित जनों ने सामूहिक रूप से “वन्दे मातरम्” का गान किया, जिससे पूरे वातावरण में राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक एकता की भावना का संचार हुआ।
इस प्रकार “लोककला : एक परिचय” कार्यक्रम न केवल एक सांस्कृतिक आयोजन के रूप में सफल रहा, बल्कि इसने लोककला के महत्व, उसकी गरिमा और उसके व्यापक दृष्टिकोण को समझने का एक सशक्त माध्यम भी प्रदान किया।