कीचड़ भरी सड़क पर स्कूल जाने को मजबूर बच्चे, ग्रामीणों ने उठाई सड़क निर्माण की मांग

आजादी के 80 वर्षों के बाद भी मेराल प्रखंड के बिकताम पंचायत के बसरिया गांव में आंगनबाड़ी केंद्र से गांधी नगर तक जाने वाली कच्ची सड़क इन दिनों बदहाली का शिकार है। बारिश के बाद सड़क पर जगह-जगह कीचड़ और गड्ढे बन जाने से आवागमन पूरी तरह प्रभावित हो गया है। स्थिति यह है कि इस रास्ते से दोपहिया और चारपहिया वाहन तो दूर, पैदल भी चलना मुश्किल हो गया है। इस सड़क से बसरिया और आसपास के ग्रामीणों के साथ बड़ी संख्या में स्कूली बच्चों का रोजाना आवागमन होता है। स्कूल जाने के दौरान बच्चे अपने कंधों पर किताब-कॉपी और भविष्य की जिम्मेदारी तथा हाथों में जूते-चप्पल लेकर कीचड़ भरे रास्ते को पार करने को मजबूर हैं। कई बच्चे अपने कपड़े और जूते खराब होने से बचाने के लिए रास्ते में जूते-चप्पल हाथ में लेकर पैदल स्कूल पहुंचते हैं।ग्रामीणों के अनुसार यही रास्ता किसानों, बुजुर्गों और मरीजों के लिए भी मुख्य आवागमन का माध्यम है। खेतों तक जाने वाले किसानों से लेकर अस्पताल जाने वाले बीमार लोगों का इसी बदहाल सड़क से होकर गुजरना पड़ता है। बारिश के दिनों में स्थिति गंभीर हो जाती है। सड़क पर बने गड्ढों में पानी और कीचड़ जमा होने से लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। ग्रामीणों की ओर से गढ़वा के उप विकास आयुक्त को लिखित आवेदन देकर समस्या के समाधान की मांग की गई थी। ग्रामीणों के अनुसार आवेदन पर संज्ञान लेते हुए डीडीसी ने मामले की जांच कर जल्द समाधान की दिशा में कार्रवाई करने का आश्वासन दिया था। ग्रामीणों ने बताया कि मुखिया सुरेश राम और पंचायत सचिव रेखा कुमारी को मामले की जांच कर सात दिनों के भीतर रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया था। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्धारित समय बीत जाने के बावजूद अब तक सड़क की समस्या के समाधान को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है। इससे ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति नाराजगी है। लोगों के अनुसार आजादी के 80वें वर्ष में पहुंच गया है, लेकिन गांव में आज भी लोगों को सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब स्कूली बच्चे, किसान, बुजुर्ग और मरीज तक इसी रास्ते पर निर्भर हैं, तो आखिर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस समस्या की ओर क्यों नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि विधायक, सांसद से लेकर पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधि चुनाव के समय ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर सक्रिय नजर आते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद जनता की समस्याएं उनकी प्राथमिकता से गायब हो जाती है।