विकास के दावों के बीच घोड़ा पहार गांव की बदहाली उजागर, बीमारों को बहंगी पर ढोने को मजबूर ग्रामीण

विकास के दावों के बीच घोड़ा पहार गांव की बदहाली उजागर, बीमारों को बहंगी पर ढोने को मजबूर ग्रामीण

पेयजल संकट, कच्ची सड़क और प्रशासनिक लापरवाही से जूझ रहा सुरसांग का आदिवासी गांव, मृत्यु प्रमाण पत्र के अभाव में अटकी विधवा पेंशन

गुमला। जिले के विकास के सरकारी दावों के बीच आज भी कई गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। इसका जीवंत उदाहरण रायडीह प्रखंड अंतर्गत सुरसांग पंचायत का घोड़ा पहार गांव है, जहां आज भी लोग सड़क, पेयजल और प्रशासनिक सुविधाओं के अभाव में कठिन जीवन जीने को मजबूर हैं।

करीब 30 घरों की आबादी वाले इस आदिवासी बहुल गांव में विकास की तस्वीर बेहद धुंधली है। यहां के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि सरकार और प्रशासन विकास के बड़े-बड़े दावे करते नजर आते हैं।

एकमात्र कुएं पर निर्भर पेयजल व्यवस्था, दूषित पानी पीने को मजबूर लोग

ग्रामीणों के अनुसार गांव में पेयजल का एकमात्र साधन एक कुआं है, जिसका पानी हर मौसम में आसानी से दूषित हो जाता है। इसके बावजूद अन्य कोई विकल्प न होने के कारण ग्रामीण इसी पानी का उपयोग करने को मजबूर हैं।

गर्मी और बरसात दोनों मौसमों में पानी की भारी किल्लत रहती है। स्थिति यह है कि महिलाओं को पानी भरने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, जिससे दैनिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और जलजनित बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है।

1 किलोमीटर की कच्ची सड़क बनी सबसे बड़ी परेशानी

सुरसांग मुख्य मार्ग से घोड़ा पहार गांव की दूरी मात्र एक किलोमीटर है, लेकिन यह पूरी सड़क कच्ची और जर्जर स्थिति में है। बरसात के मौसम में पहाड़ी क्षेत्र से बहकर आने वाला पानी इस रास्ते को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर देता है।

स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि इस रास्ते पर पैदल चलना भी कठिन हो जाता है, जबकि मोटरसाइकिल ले जाना लगभग असंभव हो जाता है।

आपात स्थिति में मरीजों को बहंगी पर ढोने की मजबूरी

ग्रामीणों ने बताया कि बरसात के दिनों में यदि गांव में कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाए या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा हो, तो एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती। ऐसी स्थिति में मरीज को मजबूरी में बहंगी पर लादकर लगभग एक किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।

ग्रामीणों ने प्रशासन की उदासीनता पर नाराजगी जताते हुए कहा कि विकास केवल कागजों तक सीमित रह गया है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

मृत्यु प्रमाण पत्र के अभाव में अटकी विधवा पेंशन

गांव की कई बेसहारा महिलाएं विधवा पेंशन योजना से वंचित हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके पतियों के मृत्यु प्रमाण पत्र निर्गत न होने के कारण पेंशन आवेदन लंबित पड़े हैं।

बार-बार प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगाने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है, जिससे महिलाएं आर्थिक सहायता से वंचित हैं।

ग्रामीणों ने उपायुक्त से लगाई गुहार, आंदोलन की चेतावनी

घोड़ा पहार गांव के ग्रामीणों ने इस गंभीर स्थिति को लेकर उपायुक्त को एक मांग पत्र सौंपा है। इसमें गांव में जलमीनार निर्माण, एक किलोमीटर सड़क का कालीकरण तथा मृत्यु प्रमाण पत्र और पेंशन मामलों के त्वरित निष्पादन की मांग की गई है।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो वे उग्र आंदोलन करने को बाध्य होंगे।

विकास की मुख्यधारा से आज भी दूर घोड़ा पहार

यह गांव आज भी इस बात का उदाहरण है कि विकास की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में कितनी बाधाओं का सामना कर रही हैं। बुनियादी सुविधाओं की कमी ने यहां के लोगों का जीवन बेहद कठिन बना दिया है।