सरहुल में गूंजा एकता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश .

सरहुल में गूंजा एकता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश ..

प्रकृति बचेगी, तभी सृष्टि रहेगी : अविनाश देव

मेदिनीनगर। प्रकृति पर्व सरहुल के अवसर पर सतबरवा सरना समिति द्वारा भव्य जुलूस निकाला गया, जिसमें आदिवासी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के प्रति आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। पारंपरिक वाद्य यंत्रों…नगाड़ा और मांदर की गूंज के साथ आदिवासी भाई-बहनों ने सामूहिक नृत्य कर सामाजिक एकता, प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया।

जुलूस के दौरान, पद्मश्री रामदयाल मुंडा के प्रसिद्ध नारे ‘जे नाची से बांची’ को पूरे उत्साह के साथ बुलंद किया गया। पूरा पलामू सरहुल के रंग में रंगा नजर आया और शहर की सड़कों पर उत्सव का उल्लास साफ झलक रहा था। विभिन्न प्रखंडों से आए सरना समितियों और आदिवासी संगठनों के लोग जिला स्कूल मैदान, मेदिनीनगर अखरा में एकत्र हुए, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सरहुल पर्व को जीवंत किया गया।

कार्यक्रम में पाहुनों द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लिया गया। इस अवसर पर संत मरियम स्कूल के चेयरमैन अविनाश देव ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी आस्था और ज़िम्मेदारी का प्रतीक है।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आधुनिक विकास के नाम पर जिस प्रकार जंगल, पहाड़, नदी और नालों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उससे मानव अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि हम प्रकृति को नहीं बचाएंगे, तो हमारा अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

कार्यक्रम का समापन ‘जय धर्मेश…जय चाला…जय सरना’ के गगनभेदी नारों के साथ हुआ, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक और उत्साहपूर्ण बना दिया।