भगवान शिव ने परिवार निर्माण की पहली शिक्षा दी थी

भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मांतर का होता है : विनोद पाठक

गढ़वा : सृष्टि में परिवार निर्माण की पहली सीख भगवान शिव ने दी थी. भगवान शिव का परिवार अनोखा और अनुकरणीय है. शिवजी के परिवार में अलग-अलग प्रकृति के जीव रहने के बावजूद सभी मिलजुल कर रहते हैं. यह सीख किसी भी परिवार निर्माण के लिये हो सकती है. यह बात गायत्री परिवार के विनोद पाठक ने कही. ओम समिति द्वारा आयोजित गायत्री शक्तिपीठ कल्याणपुर में श्रीराम कथा के चौथे दिन शिव विवाह प्रसंग के दौरान उन्होंने यह बात कही. उन्होंने कहा कि भगवान शिव की सवारी बैल है, जबकि मां भवानी की सवारी शेर है. हम जानते हैं कि बैल शेर के लिये आहार होता है. लेकिन चूकि दोनों एक ही परिवार की अंग हैं, इसलिये शेर का बैल के प्रति हिंसक भाव नहीं है. इसी तरह से गणेशजी की सवारी चूहा है, जबकि शिवजी के गले में सर्प है. चूहा सर्प का आहार है, लेकिन चूकि दोनों एक परिवार के हैं, इसलिये दोनों अहिंसक भाव से मिलजुलकर रहते हैं. इधर कार्तिकजी की सवारी मयूर है, जिसका सर्प आहार है. लेकिन यहां भी दोनों साथ रहते हैं. श्री पाठक ने कहा कि परिवार का यही आदर्श दृष्टिकोण किसी भी परिवार पर लागू होता है. उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के रूप में शिव-पार्वती हमारी संस्कृति में आदर्श हैं. दोनों शरीर से अलग-अलग दिखने के बावजूद दोनों एक हैं. इसीलिये शिवजी को अर्द्धनारिश्वर भी कहा जाता है. उनका जीवन चरित्र हमें यह शिक्षा देता है कि पति-पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मांतर का होता है. उन्होंने इसकी व्याख्या करते हुये कहा कि सती ने वन में भटकते भगवान राम की परीक्षा लेने के लिये अपनी योग माया से माता सीता का रूप धारण किया था. इसका भान होते ही शिवजी ने सती का हृदय से त्याग कर दिया था. इसलिये कि वे अपने आराध्य राम की पत्नी का रूप् धारण की हुई नारी को अपनी अर्द्धांगनि कैसे बना सकते थे. इसके बाद शिवजी 87 हजार वर्ष तक के लिये समाधि में चले गये थे. फिर सती के शरीर त्याग के बाद शिवजी से उनकी मुलाकात दूसरे जन्म में तब हुई, जब वे राजा हिमालय के यहां पार्वती के रूप में दूसरा जन्म ली. वर्षों अलग रहने के बावजूद मां पार्वती के हदय में कोई दूसरा पुरूष पति रूप में नही आया. श्री पाठक ने कहा कि लेकिन आज पति-पत्नी और परिवार में छोटी-छोटी बातों को लेकर तुरंत संबंध विच्छेद हो जा रहा है. विवाह के समय वेदमंत्रों के साथ सात फेरे लेते समय सात जन्म तक साथ रहने का शपथ लेने के बावजूद कुछ ही वर्षों में पति-पत्नी अलग हो जा रहे हैं. परिवार में असहिष्णुता की स्थिति कितनी बढ़ गयी है, इसका अंदाजा किसी भी जिले के कुटुंब न्यायालय में जाकर वहां आनेवाले मामले को देखकर लगाया जा सकता है. कुटुंब न्यायालय में पारिवारिक विवाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. धर्म शास्त्रों में जो हमारे भगवान का चरित्र बताया गया है, उसको न सिर्फ पढ़ना-सुनना चाहिये, बल्कि आत्मसात करना चाहिये. तभी हम अपने बिखरते परिवार एवं समाज को बचा सकते हैं.

समाजसेवियों ने किया प्रवचन का उदघाटन

गुरूवार की शाम श्रीराम का कथा उदघाटन समाजसेवी उपेंद्र सिंह, ज्योति प्रकाश, विभा प्रकाश, पुनमचंद कांस्यकार, सरयू चंद्रवंशी एवं मुकेश कश्यप ने संयुक्त रूप से अखंड दीप जलाकर एवं देवपूजन कर किया. संगीत में शिवपूजन व्यास ने शिव विवाह प्रसंग पर कई गीत सुनाकर श्रोताओं को ताली बजाने को मजबूर किया. सह गायक उपेंद्र शर्मा, ढोलक पर श्याम सुंदरजी, बैंजो पर रंजीत विश्वकर्मा एवं झाल पर नंदू ठाकुर एवं अशोक विश्वकर्मा ने संगत किया. संचालन अखिलेश कुशवाहा ने किया.