सूचना का अधिकार अधिनियम के 20 वर्ष पूर्ण — गुमला में आरटीआई कार्यकर्ताओं ने मनाया सूचनाधिकार दिवस, पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन पर दिया जोर
सूचना का अधिकार अधिनियम के 20 वर्ष पूर्ण — गुमला में आरटीआई कार्यकर्ताओं ने मनाया सूचनाधिकार दिवस, पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन पर दिया जोर
गुमला – सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के 20 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर रविवार को गुमला के बिरसा मुंडा एग्रो पार्क में जिले के आरटीआई कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक एवं बुद्धिजीवी एकत्रित हुए। इस अवसर पर केक काटकर, मिठाइयां बांटी गईं और कार्यशाला आयोजित कर “सूचनाधिकार दिवस” मनाया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य था — नागरिकों में सूचना के अधिकार के प्रति जागरूकता फैलाना, शासन की पारदर्शिता पर चर्चा करना, तथा सूचना कानून के कमजोर क्रियान्वयन पर चिंता प्रकट करना।
सूचना का अधिकार — भारत की दूसरी आज़ादी : आनंद किशोर पंडा
कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय सूचना अधिकार रक्षा मंच के केंद्रीय महासचिव एवं वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता आनंद किशोर पंडा ने की।
उन्होंने कहा की 12 अक्टूबर 2005 को भारतीय संसद द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम लागू किया गया था। यह दिन भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का ऐतिहासिक अध्याय है। इस कानून ने आम नागरिकों को शासन-प्रशासन के कामकाज में झांकने का अधिकार दिया। यह भारत की दूसरी आज़ादी है, जिसने जनता को सवाल पूछने, जवाब मांगने और सरकार को जवाबदेह बनाने की ताकत दी।”
उन्होंने कहा कि आरटीआई कानून ने लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूती दी है, लेकिन सरकारी लापरवाही और राजनीतिक उदासीनता के कारण यह कानून अपनी प्रभावशीलता खो रहा है। उन्होंने मांग की कि राज्य और केंद्र सरकार आरटीआई को पुनः सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाएं।
आरटीआई जनता का हथियार, इसे भोथरा न बनाया जाए- शंभूनाथ सिंह
आरटीआई कार्यकर्ता शंभूनाथ सिंह ने कहा की सूचना का अधिकार आम जनता का हथियार है, जिसके बल पर वे प्रशासनिक भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं। लेकिन सरकार की मंशा इस हथियार को भोथरा बनाने की दिख रही है। आयोग की निष्क्रियता और संशोधनों से यह कानून कमजोर हो रहा है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
सूचनाधिकार दिवस नागरिक सशक्तिकरण का प्रतीक – सुनील कुमार वर्मा
शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कुमार वर्मा ने कहा की सूचनाधिकार दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि नागरिक सशक्तिकरण का प्रतीक है। यह कानून नागरिकों को प्रशासन पर निगरानी रखने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की ताकत देता है। हर नागरिक को इसका सही उपयोग जानना और करना चाहिए।
कानून का पालन नहीं, प्रशासनिक उदासीनता हावी
सामाजिक कार्यकर्ता मेघनाथ प्रसाद ने कहा कि जिले और राज्य स्तर पर सूचना कानून का अनुपालन सही ढंग से नहीं हो रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता दिलीप कुमार साहू ने कहा की धारा 7(1) के तहत सूचना 30 दिनों में उपलब्ध करानी है, परंतु अधिकतर जन सूचना अधिकारी इस प्रावधान की अवहेलना करते हैं। इससे आम नागरिकों का विश्वास कमजोर हो रहा है।
सुनील कुमार दास ने कहा की प्रथम अपील के मामलों में भी अधिकारी लापरवाही बरतते हैं। महीनों तक सुनवाई टाली जाती है और बाद में अधूरी सूचनाएं देकर मामला बंद कर दिया जाता है। यह कानून के साथ खिलवाड़ है।
राज्य सूचना आयोग में सूचनायुक्तों की नियुक्ति तत्काल हो
भूतपूर्व सैनिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता तारसियूस एक्का ने कहा की राज्य सूचना आयोग की निष्क्रियता ने कानून को लगभग बेअसर बना दिया है। छह वर्षों से एक भी सूचनायुक्त नहीं है, जिससे आयोग महज नाम के लिए रह गया है।
सेवानिवृत्त कर्मचारी बनु बाबु ने कहा की राज्य सरकार की यह चुप्पी शर्मनाक है कि वर्षों से मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों के पद खाली हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की भावना के भी विपरीत है।
नारायण भगत, महासचिव — टाना भगत शिष्टमंडल प्रतिनिधि कमिटी (झा. प्र.), ने कहा की राज्य सूचना आयोग की निष्क्रियता से अधिकारी निर्भीक हो गए हैं। जब जवाबदेही समाप्त होती है, तो भ्रष्टाचार को खुली छूट मिलती है। सरकार को तुरंत आयोग को सक्रिय करना चाहिए।
आरटीआई जनता और लोकतंत्र की रक्षा का कवच है – रणधीर निधि
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में उपस्थित आरटीआई विशेषज्ञ रणधीर निधि ने कहा की सूचना का अधिकार अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। यह नागरिकों और शासन के बीच पारदर्शिता का पुल है। आज जब सरकारें जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रही हैं, तब आरटीआई ही वह माध्यम है जो नागरिकों को सशक्त बनाकर शासन को उत्तरदायी बनाए रखता है।
उन्होंने आगे कहा की राज्य सूचना आयोग की निष्क्रियता, समयबद्ध सूचना आपूर्ति की अनदेखी और अपीलीय अधिकारियों की लापरवाही ने जनता के विश्वास को चोट पहुंचाई है। सरकार को चाहिए कि वह आरटीआई प्रणाली को पुनर्जीवित करे, ताकि यह फिर से जनता की आवाज बन सके।
रणधीर निधि ने यह भी सुझाव दिया कि जिले में “आरटीआई हेल्प डेस्क” की स्थापना की जाए, जहां आम नागरिकों को आवेदन लिखने से लेकर अपील प्रक्रिया तक की कानूनी सहायता मिल सके।
कार्यशाला में रखे गए सुझाव
कार्यशाला के दौरान उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने निम्नलिखित सुझाव रखे की प्रत्येक जिला मुख्यालय में आरटीआई सहायता केंद्र की स्थापना हो।
आरटीआई अपील और जवाबदेही की ऑनलाइन ट्रैकिंग प्रणाली बनाई जाए।
निष्क्रिय जन सूचना अधिकारियों पर वित्तीय दंड और अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
स्कूलों, कॉलेजों और पंचायतों में सूचना अधिकार पर जन-जागरूकता अभियान चलाया जाए।
लंबित मामलों की सुनवाई हेतु राज्य सूचना आयोग में विशेष शिविर लगाए जाएं।
कार्यक्रम में रही व्यापक भागीदारी
इस अवसर पर आनंद किशोर पंडा, बनु बाबु, रणधीर निधि, सुनील कुमार दास, दिलीप कुमार साहू, तारसियूस एक्का, मो. आफताब आलम, मेघनाथ प्रसाद, बिरेंद्र तिर्की, नारायण भगत, सुनील कुमार वर्मा, शंभूनाथ सिंह, प्रमोद सिंह, अनील कुमार पंडा, बी. दास, शुभम कुमार, गजानन साहु, महेंद्र उरांव, प्रवीण साहु, लाल अरविंद कुमार, अर्जुन महतो, बादल सिंह, अशोक प्रसाद सोनी, प्रवीण यादव सहित दर्जनों आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे।

