‘सबकी आस सुभाष’ में है प्रोफेसर मिश्रा के चुंबकीय व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक:- नामधारी
प्रोफेसर सुभाष चंद्र मिश्रा ने शिक्षा के साथ अनेक विधाओं से समाज पर डाला प्रभाव:- संजय कुमार
धुंध पर भारी पड़ा साहित्यकारों का धुन
सदर मेदिनीनगर प्रखंड अंतर्गत रजवाडीह मध्य विद्यालय में प्रोफेसर सुभाष चंद्र मिश्रा के व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित संस्मरणात्मक पुस्तक ‘सबकी आस सुभाष’ का अनूठे अंदाज में लोकार्पण किया गया। भारी धुंध पर साहित्यकारों का धुन भारी पड़ा। लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि झारखंड के प्रथम विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी,मुख्य वक्ता गढ़वा के लोकप्रिय अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार व विशिष्ट अतिथि अविनाश देव की मौजूदगी उत्साहवर्द्धक रही। समारोह की अध्यक्षता प्रोफेसर कमलाकांत मिश्रा ने किया। संचालन पुस्तक के संपादक परशुराम तिवारी ने किया। विद्या की अधिष्ठात्री मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित करने के उपरांत मंचासीन इंदर सिंह नामधारी,गढ़वा एसडीएम संजय कुमार, सभाध्यक्ष कमलाकांत मिश्र,साहित्यकार सुरेन्द्र कुमार मिश्र,काष्ठ कलाकार प्रेम भसीन,अविनाश देव,राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक सह कवि हरिवंश प्रभात,लोकतंत्र सेनानी रविशंकर पाण्डेय,पत्रकार अविनाश,सेसा महासचिव कौशिक मल्लिक,प्रभात मिश्रा सुमन व मुखिया अनुज कुमार त्रिपाठी तथा सामने बैठे समस्त अतिथियों के हाथों एक साथ ‘सबकी आस सुभाष’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ। इसमें 64 लेखकों की रचनाएं संग्रहित हैं।इसके पहले अंगवस्त्र व सबकी आस सुभाष पुस्तक देकर सभी अतिथियों का स्वागत किया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि श्री इंदर सिंह नामधारी ने कहा कि ‘सबकी आस सुभाष’ पुस्तक में प्रोफेसर सुभाष चंद्र मिश्रा के चुंबकीय व प्रेरक व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक है। उन्होंने प्रोफेसर मिश्रा से व्यक्तिगत निकटता,कर्मठता व शैक्षिक-सामाजिक योगदान की सराहना की,किन्तु उनकी अस्वस्थता की चर्चा करते हुए वे भावुक हो गये। वहीं मुख्य वक्ता गढ़वा एसडीएम संजय कुमार ने ‘सबकी आस सुभाष’ के विभिन्न रचनाओं को उद्धृत करते हुए कहा कि प्रोफेसर मिश्रा सर के बारे में खूब लिखने के बाद भी कोई रचनाकार तृप्त नहीं हुआ,जिससे उनके बहुआयामी, बहुभाषी व वृहद व्यक्तित्व की छवि परिलक्षित होती है। उन्होंने कहा कि प्रोफेसर मिश्रा ने न सिर्फ शिक्षा,वरन अनेक विधाओं के माध्यम से समाज में रोशनी फैलायी है तथा सकारात्मक प्रभाव डाला है। उन्होंने संपादकीय की एक पंक्ति- ‘बस मैंने सागर से निकले कुछ मोतियों का भिक्षाटन कर एक जगह इकट्ठा किया और उन्हें पुनः परोस दिया’ की व्याख्या करते हुए कहा कि संपादक परशुराम तिवारी ने इसके माध्यम से पुस्तक के मूल भाव को सफलता पूर्वक उद्घाटित कर दिया है।समारोह का सराहनीय संयोजन विद्यालय की शिक्षिका श्रीमती निशा,प्रियंका कुमारी, पूनम रानी, शिक्षक विजय कुमार ठाकुर व लैब इंस्ट्रक्टर अनूप कुमार मिश्रा ने किया।
इस मौके पर फिल्म निर्माता-निर्देशक पुलिन मित्रा, शिक्षाविद हरिशंकर मिश्र,सदर डीडीओ अजय पाण्डेय, पूर्व डीडीओ वीरेंद्र कुमार द्विवेदी, शायर एमजे अजहर, कवि राकेश कुमार, अमन चक्र, विजय शंकर मिश्र, रमेश कुमार सिंह, उमेश कुमार पाठक रेणु, ममता झा मेधा, रीना प्रेम दूबे, बृजेश शुक्ला, जितेन्द्र कुमार तिवारी, स्मृति मिश्रा, अमृता पाठक, डा.अवधेश पाण्डेय, मनीष तिवारी, शीला श्रीवास्तव, मानस मिश्रा, शुभ्रा मिश्रा, दिनेश कुमार शुक्ला व अनुज कुमार पाठक ने कहा कि प्रोफेसर सुभाष चंद्र मिश्रा की वाणी व कर्मयोग का प्रभाव सिर्फ उनके शिष्यों तक सीमित नहीं,बल्कि समाज के हर वर्ग व हर क्षेत्र में है। वास्तव में प्रोफेसर सुभाष चंद्र मिश्रा सबकी आस हैं। सबने संपादक परशुराम तिवारी के संयोजन व संपादन की सराहना की। प्रोफेसर मिश्रा ने सभी लेखकों को शुभकामनाएं देते हुए शिष्य परशुराम तिवारी को यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया।
इस मौके पर रागिनी मिश्रा,अलका मिश्रा, संजू शुक्ला, डीडीओ सत्येन्द्र तिवारी, प्रधान लिपिक राजीव रंजन पाण्डेय, ललन प्रजापति, कामेश्वर राम, रथिन्द्र नाथ झा, अमरेंद्र पाठक, अनीता देवी, पंकज श्रीवास्तव, अंजनी कुमार दूबे, रविशंकर पाण्डेय, शिवध्यान तिवारी, मयूरेश द्विवेदी, राकेश पाण्डेय व अरुण तिवारी सहित काफी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

