डॉ. संध्या पूरेचा की सांस्कृतिक दृष्टि और भारत की कलात्मक भविष्य-यात्रा

जब संस्कृति बनती है साधना


डॉ. संध्या पूरेचा की सांस्कृतिक दृष्टि और भारत की कलात्मक भविष्य-यात्रा


      नई दिल्ली के किसी सभागार में कलाकारों से घिरी एक सहज, संवादशील और ऊर्जावान व्यक्तित्व। सामने लोक कलाकार हैं, कहीं शास्त्रीय संगीत के साधक, तो कहीं रंगकर्मी अपनी चुनौतियाँ साझा कर रहे हैं। मंच और श्रोताओं के बीच कोई दूरी नहीं है। यह दृश्य केवल एक औपचारिक बैठक का नहीं, बल्कि भारतीय कला-जगत के साथ जीवंत संवाद का है। इस संवाद के केंद्र में हैं—डॉ. संध्या पूरेचा।
     भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में डॉ. संध्या पूरेचा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। प्रतिष्ठित भरतनाट्यम नृत्यांगना, कोरियोग्राफर, लेखिका, शोधकर्ता तथा सांस्कृतिक प्रशासक के रूप में उन्होंने अनेक आयामों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।      
      कालिदास सम्मान और संगीत नाटक अकादमी सम्मान जैसे प्रतिष्ठित अलंकरणों से सम्मानित डॉ. पूरेचा वर्तमान में संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली की अध्यक्ष हैं। W-20 की अध्यक्षा के रूप में भी उन्होंने भारत की सांस्कृतिक दृष्टि को वैश्विक मंच पर प्रभावी स्वर प्रदान किया है।
       किन्तु उनकी सबसे बड़ी विशेषता शायद यह है कि वे संस्कृति को केवल प्रदर्शन या उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत् राष्ट्रीय दायित्व के रूप में देखती हैं।

कलाकारों तक पहुँचने वाली अध्यक्ष

        देश की सर्वोच्च प्रदर्शनकारी कला संस्था का नेतृत्व करते हुए डॉ. पूरेचा ने एक ऐसी पहल को लोकप्रिय बनाया है जिसने कलाकारों और संस्थाओं के बीच की दूरी को कम किया है। "मीट द आर्टिस्ट" कार्यक्रम के माध्यम से वे देश के विभिन्न भागों में जाकर कलाकारों से प्रत्यक्ष संवाद करती हैं।
      यह संवाद केवल औपचारिकता नहीं होता। कलाकारों की आर्थिक चुनौतियाँ, प्रशिक्षण की समस्याएँ, नई पीढ़ी का कला से विमुख होना, पारंपरिक कलाओं का संरक्षण और सांस्कृतिक नीतियों की प्रभावशीलता जैसे विषय इन बैठकों का हिस्सा बनते हैं।

शायद यही कारण है कि उनके नेतृत्व में कला प्रशासन केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कलाकारों के बीच पहुँचने वाला एक जीवंत तंत्र बनता दिखाई देता है।

     एक विचार जो नीति भी है और दर्शन भी 

    वर्षों के अनुभव, अध्ययन और सांस्कृतिक नेतृत्व के आधार पर डॉ. पूरेचा ने भारतीय कला-जगत के भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण वैचारिक रूपरेखा प्रस्तुत की है— “साधना (SADHANA)” ।

      भारतीय परंपरा में साधना का अर्थ केवल अभ्यास नहीं है। यह आत्मानुशासन, समर्पण, ज्ञान, संवेदनशीलता और उत्कृष्टता की निरंतर खोज का नाम है। डॉ. पूरेचा ने इसी शब्द को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के भविष्य का आधार बनाया है।
       उनकी यह अवधारणा पाँच महत्वपूर्ण स्तंभों पर आधारित है—

१) जीवंत विरासत का संरक्षण,

२) गुरु-शिष्य परंपरा,

३) शास्त्र और व्यवहार का संवाद,

४) विरासत-आधारित नवाचार

५) राष्ट्रीय पहचान और सॉफ्ट पावर के रूप में कला।

संस्कृति संग्रहालयों में नहीं, लोगों के बीच जीवित रहती है

     डॉ. पूरेचा का पहला आग्रह है कि संस्कृति को केवल संरक्षित करने की वस्तु के रूप में नहीं देखा जा सकता। किसी मूर्ति या स्मारक को संग्रहालय में सुरक्षित रखा जा सकता है, लेकिन संगीत, नृत्य और रंगमंच तभी तक जीवित रहते हैं जब तक उनका अभ्यास और प्रदर्शन जारी रहता है।
     यही कारण है कि संगीत नाटक अकादमी ने कला दीक्षा, कला धरोहर और कला संवाद जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाया है। इन पहलों का उद्देश्य केवल दस्तावेजीकरण नहीं, बल्कि परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।
        छऊ, कुटियाट्टम और अन्य विशिष्ट कला-परंपराओं में वरिष्ठ गुरुओं के माध्यम से युवा कलाकारों को तैयार करने का प्रयास इसी सोच का परिणाम है।

  गुरु-शिष्य परंपरा : भारतीय कला की आत्मा 

    डिजिटल युग में ज्ञान तक पहुँच आसान हुई है, लेकिन कला का आत्मबोध अभी भी गुरु के सान्निध्य में ही संभव है। डॉ. पूरेचा मानती हैं कि कला केवल तकनीक नहीं है। वह संवेदना, दृष्टि और संस्कार भी है।
      भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की विशेषता यही है कि उसमें केवल कौशल नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य भी हस्तांतरित होते हैं। यही कारण है कि वे इस परंपरा को भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मानती हैं।

जब शास्त्र और मंच का संवाद होता है

      भारतीय कलाओं का आधार केवल अभ्यास नहीं, बल्कि गहन वैचारिक परंपरा भी है। नाट्यशास्त्र, अभिनय दर्पण और संगीत रत्नाकर जैसे ग्रंथ सदियों से भारतीय कला-दर्शन का मार्गदर्शन करते रहे हैं।
    डॉ. पूरेचा का मानना है कि कलाकार और विद्वान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि कलाकार शास्त्र से दूर हो जाए तो उसकी अभिव्यक्ति का आधार कमजोर पड़ सकता है और यदि विद्वान व्यवहार से कट जाए तो उसका अध्ययन जीवंतता खो सकता है।
       इसलिए शोध, प्रकाशन, संगोष्ठियों और दस्तावेजीकरण को वे सांस्कृतिक विकास का अनिवार्य हिस्सा मानती हैं।

परंपरा और नवाचार : विरोध नहीं, सहयोग

    आधुनिक समय में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि परंपरा और नवाचार में किसे प्राथमिकता दी जाए। डॉ. पूरेचा का उत्तर स्पष्ट है—दोनों को।

उनके अनुसार वास्तविक नवाचार वही है जो अपनी जड़ों को पहचानता हो। भारतीय संस्कृति का इतिहास स्वयं इस बात का प्रमाण है कि प्रत्येक पीढ़ी ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार परंपराओं की नई व्याख्या की है।
इसलिए वे एक ऐसे सांस्कृतिक वातावरण की पक्षधर हैं जहाँ प्रयोग भी हो और परंपरा का सम्मान भी बना रहे।

    वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति का स्वर 

      डॉ. पूरेचा के नेतृत्व में अनेक ऐसे आयोजन हुए हैं जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक शक्ति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान दी है।
    भारत मंडपम् के उद्घाटन समारोह की सांस्कृतिक परिकल्पना हो या यशोभूमि में भगवान धन्वंतरि पर आधारित प्रस्तुति, जी-20 शिखर सम्मेलन के लिए 150 दुर्लभ भारतीय वाद्ययंत्रों के विशाल संगीत-वृंद का निर्देशन हो या “गंधर्व अयोध्या” जैसी विशिष्ट प्रस्तुति—इन सभी आयोजनों में भारतीय सभ्यता की गहराई और कलात्मक विविधता का प्रभावशाली प्रदर्शन दिखाई देता है।
     महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिए वीरांगनाओं और वीर बाल दिवस पर आधारित कार्यक्रम, श्रीराम जन्मभूमि उद्घाटन समारोह के लिए विशेष संगीत-वृंद, “उत्कर्ष” लोक एवं जनजातीय कला महोत्सव तथा विश्व धरोहर समिति के प्रतिनिधियों के स्वागत हेतु विशेष सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ इस व्यापक दृष्टि के अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
       इन आयोजनों ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की सृजनशील शक्ति और भविष्य की संभावनाओं का आधार भी है।

साधना : भविष्य का सांस्कृतिक मंत्र

    आज जब वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और बदलती जीवन-शैलियाँ सांस्कृतिक परिदृश्य को प्रभावित कर रही हैं, तब भारतीय कला-जगत के सामने अनेक चुनौतियाँ उपस्थित हैं। ऐसे समय में डॉ. संध्या पूरेचा की “साधना” अवधारणा एक मार्गदर्शक प्रकाशस्तंभ की तरह दिखाई देती है।
      यह केवल एक सांस्कृतिक नीति नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक दर्शन है। ऐसा दर्शन जो संरक्षण और नवाचार, परंपरा और आधुनिकता, शास्त्र और व्यवहार, कलाकार और समाज—सभी के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
       भारतीय संस्कृति की शक्ति उसकी निरंतर पुनर्रचना में रही है। वह समय के साथ बदलती है, किन्तु अपनी आत्मा को सुरक्षित रखती है। डॉ. संध्या पूरेचा की “साधना” इसी आत्मा को भविष्य की ओर ले जाने का एक सार्थक और दूरदर्शी प्रयास है।
      भारतीय कला-जगत के लिए यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि आने वाले समय की सांस्कृतिक दिशा का घोष भी है।