बिखरते परिवारों को बचाने में रामचरितमानस की बढ़ी प्रासंगिकता, तुलसी जयंती पर हुई विचार गोष्ठी
बिखरते परिवार को बचाने में रामचरित मानस की प्रासंगिकता बढ़ गयी है
भारतीय परिवार व्यवस्था का अनुपम उदाहरण मिलता है रामचरित मानस में
तुलसी जयंती पर विचार गोष्ठी सह काव्य पाठ का आयोजन
गढ़वा : सृजन साहित्यिक मंच गढ़वा द्वारा तुलसी जयंती के अवसर पर एक विचार गोष्ठी सह काव्य पाठ का आयोजन किया गया. श्रावण शुक्ला सप्तमी के अवसर पर बुधवार की शाम स्थानीय ज्ञान निकेतन कॉन्वेंट स्कूल के प्रशाल में आयोजित इस गोष्ठी में रचनाकारों ने तुलसीकृत रामचरित मानस की आज के समय में प्रासंगिकता विषय पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये. गोष्ठी का आरंभ संत तुलसीदासजी के चित्र पर दीप जलाकर एवं पुष्प अर्पित कर किया गया. तत्पश्चात गोष्ठी में विषय प्रवेश कराते हुये सचिव सतीश कुमार मिश्र ने कहा कि संत तुलसीदासकृत रामचरित मानस एक महाग्रंथ है. इसकी तुलना दुनिया के किसी भी अन्य ग्रंथों से नहीं की जा सकती. लेकिन कुछ विदेशी साहित्यकार बिना रामचरित मानस की गहराई और इसके मूल तत्व को ठीक से समझे संत तुलसीदास की तुलना कभी शेक्सपियर तो कभी मैक्समूलर से करते हैं. जबकि रामचरित मानस एक कालजयी ग्रंथ है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतना ही है, जितना उसकी रचनाकाल में थी. विशेषकर आज टूटते भारतीय परिवार व्यवस्था को फिर से बचाने एवं नयी पीढ़ी को दिशा देने के लिये सभी प्रकार के सूत्र रामचरित मानस में मौजूद हैं. गोष्ठी को आगे बढ़ाते हुये अधिवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि पहले विद्यालयों से लेकर गांव के चौपालों तक रामचरित मानस की चौपाईयों का गायन सुनने को मिलता था. लेकिन आज इसका लोप हो चुका है. इसका असर वर्तमान समाज पर पड़ रहा है. मंच के संरक्षक रासबिहारी तिवारी ने कहा कि पहले खेत में हल जोतनेवाले हलवाहे भी रामचरित मानस की पंक्तियां गाते थे. गांवों में होनेवाले पारिवारिक झगड़ों को रामचरित मानस के पात्रों और प्रसंगों का उदाहरण देकर सुलझा दिया जाता था. लेकिन आज के अधिकांश लोग रामचरित मानस की एक चौपाई भी जानते हैं. शिक्षक डॉ आशीष अविरल चतुर्वेदी ने मानस की चौपाईयों का गायन करते हुये प्रभु राम सहित सभी भाईयों और उनकी पत्नियों के चरित्र का चित्रण किया. उन्होंने कहा कि प्रभु राम उनके परिवार के चरित्र से प्रेरणा लेकर हर पारिवारिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. अधिवक्ता राकेश शुक्ला ने रामचरित मानस के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुये कहा कि प्रभु राम के जीवन की घटनाओं से हमें सीख लेने की जरूरत है. उपाध्यक्ष राजमणि राज ने अपने छंद एवं कविता के माध्यम से तुलसीदासजी के चरित्र का गायन किया. उन्होंने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि आज के विद्यार्थी संत तुलसीदास का नाम भी नहीं जानते हैं. अध्यक्ष विनोद पाठक ने कहा कि आज बड़े-बड़े आयोजन कर मानस कथा कराया जा रहा है. टीवी और सोशल मीडिया पर भी रामकथा बड़े पैमाने पर प्रसारित हो रहे हैं, लेकिन बिगड़ते समाज को बचाने में यह पूरी तरह से असफल साबित हो रहा है. संयुक्त परिवार से बिखर कर हम एकल परिवार में सिमट गये, लेकिन वहां भी जीवन अशांत और दुखी है. ऐसे में रामचरित मानस के जीवन सूत्रों को जन-जन तक लेजाकर हम पारिवारिक पतन को रोक सकते हैं. गोष्ठी में शिक्षक दिनेश कुमार चौबे ने रामचरित मानस के कहा कि आज पहले की तुलना में रामचरित मानस की प्रासंगिकता अधिक है. अधिवक्ता राजीव रंजन तिवारी ने कहा कि रामचरित मानस के हर पात्र हमारे लिये प्रेरणास्त्रो हैं. समाजसेवी रामाशंकर चौबे ने अपनी कविता के माध्यम से तुलसीदास के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किया. गोष्ठी में लॉ की विद्यार्थी दिव्य प्रकाश ने भी विचार वयक्त किये. कार्यक्रम का संचालन करते हुये कोषाध्यक्ष प्रमोद कुमार ने बारी-बारी से विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुये समारोह को रोचक बनाया. अंत में कई रचनाकारों ने अपनी कविताओं की प्रस्तुति से कार्यक्रम को सरस बनाने का काम किया

