गढ़वा में घोष प्रशिक्षण वर्ग, 10 विद्यालयों के 67 विद्यार्थी सीख रहे अनुशासन और राष्ट्र चेतना

गढ़वा: सरस्वती विद्या मंदिर, गढ़वा में आयोजित विभाग स्तरीय घोष प्रशिक्षण वर्ग के दूसरे दिन मुख्य वक्ता श्री राजेश प्रसाद (संयोजक, शारीरिक एवं घोष विषय, उत्तर-पूर्व क्षेत्र) ने शिक्षार्थियों को संबोधित किया। उन्होंने घोष कला और संगीत के महत्व को रेखांकित करते हुए इसका संबंध राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा।
राष्ट्रीय चेतना और अनुशासन का प्रतीक: घोष प्रशिक्षण सरस्वती विद्या मंदिर गढ़वा के प्रांगण में आयोजित इस विभाग स्तरीय घोष प्रशिक्षण वर्ग में 10 विद्यालयों के कुल 67 विद्यार्थी कड़े अनुशासन के साथ प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। प्रशिक्षण के दूसरे दिन वंदना सभा को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि और उत्तर-पूर्व क्षेत्र के शारीरिक एवं घोष विषय के संयोजक श्री राजेश प्रसाद ने छात्र-छात्राओं का मार्गदर्शन किया।श्री राजेश प्रसाद ने अपने संबोधन में कहा कि घोष (बैंड) केवल वाद्य यंत्रों को बजाना नहीं है, बल्कि यह सामूहिक अनुशासन, एकाग्रता और देशभक्ति की भावना को जागृत करने का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने इस विधा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा, “घोष की हर ध्वनि और कदम की थाप विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता और सहकारिता की भावना का संचार करती है। यह हमारी प्राचीन और गौरवशाली परंपरा का हिस्सा है, जो मन को संयमित करना सिखाती है।
“प्रशिक्षण का दूसरा दिन: छायाचित्र और वीडियो कार्यक्रम के दूसरे दिन विद्यार्थियों ने विभिन्न घोष वाद्यों जैसे आनक (ड्रम), वंशी और शंख के वादन का सघन अभ्यास किया। इस अवसर पर विद्यालय प्रबंधन द्वारा प्रशिक्षण वर्ग की गतिविधियों के कुछ छायाचित्र और वीडियो भी जारी किए गए, जिसमें शिक्षार्थियों का उत्साह और कड़ा अभ्यास साफ देखा जा सकता है।

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