डॉलर संकट के बीच भारत की बड़ी चुनौती, आखिर क्यों आत्मनियंत्रण की अपील कर रही है सरकार

डॉलर संकट के बीच भारत की बड़ी चुनौती, आखिर क्यों आत्मनियंत्रण की अपील कर रही है सरकार?

भारत इस समय बढ़ते आयात और कमजोर होते रुपये की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। देश दुनिया से ज्यादा सामान खरीद रहा है और कम बेच रहा है, जिसके कारण हर महीने अरबों डॉलर बाहर जा रहे हैं। भारत का आयात-निर्यात घाटा करीब 120 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, यानी हर महीने लगभग 10 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च हो रहे हैं।

भारत का सबसे बड़ा खर्च कच्चे तेल के आयात पर हो रहा है, जिस पर पिछले वर्ष लगभग 134 अरब डॉलर खर्च हुए। इसके अलावा सोने के आयात पर 72 अरब डॉलर, विदेश यात्राओं पर 31 अरब डॉलर, खाद्य तेलों पर 19.5 अरब डॉलर और उर्वरकों पर 14.5 अरब डॉलर खर्च किए गए। इन बढ़ते खर्चों से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बाहर जा रहा है।

वैश्विक युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल और उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल आया है। इसका असर यह हुआ कि भारत पर हर महीने करीब 8 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया। अब कुल डॉलर गैप लगभग 18 अरब डॉलर प्रति माह तक पहुंच चुका है, जिससे रुपये पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।

हालांकि दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें 25% से 60% तक बढ़ चुकी हैं, लेकिन भारत सरकार ने आम जनता पर बोझ कम रखने की कोशिश की है।

विशेषज्ञों के अनुसार इसका तात्कालिक समाधान अनावश्यक विदेशी खर्च और आयात को कम करना है। वहीं दीर्घकालिक समाधान “मेक इन India” को मजबूत बनाना, निर्यात बढ़ाना और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देना है।

सरकार की आत्मनियंत्रण की अपील का सीधा संदेश है — जब तक वैश्विक संकट बना हुआ है, तब तक समझदारी से खर्च करना ही देशहित में सबसे बड़ा योगदान हो सकता है।

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