संस्कारों की मिसाल: बरगंडा विद्यालय में दादा-दादी सम्मान समारोह ने भावुक किया माहौल
संस्कारों की पाठशाला बना सरस्वती शिशु विद्या मंदिर,बरगंडा: ‘दादा-दादी, नाना-नानी सम्मान समारोह’ में छलका बुजुर्गों का आशीर्वाद, भाव-विभोर हुआ विद्यालय परिसर
गिरिडीह: जब आधुनिकता की दौड़ में रिश्ते पीछे छूट रहे हैं, तब सरस्वती शिशु विद्या मंदिर, बरगंडा ने शुक्रवार को एक मिशाल पेश की। विद्यालय परिसर में आयोजित भव्य ‘दादा-दादी/नाना-नानी सम्मान समारोह 2026’ में परंपरा, संस्कार और भावनाओं का ऐसा संगम दिखा कि हर आँख नम हो गई।
मंच संचालिका मोनालिसा जी के कुशल संचालन में समारोह का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं वंदना से हुआ। प्रधानाचार्य आनंद कमल जी ने पधारे हुए शताधिक दादा-दादी, नाना-नानी का अंगवस्त्र व पुष्पगुच्छ से अभिनंदन कर कहा, “आप हमारे विद्यालय के जीवंत संस्कार-स्तंभ हैं। आप ही बच्चों की पढ़ाई के पाठ्यक्रम का प्रथम अध्याय हैं।आपके बिना शिक्षा अधूरी है।”
श्रीमती रूपम जी ने ‘विषय प्रवेश’ में कहा, “दादी की लोरी और दादा की कहानियाँ ही बच्चे का पहला स्कूल हैं। इनकी गोद में ही चरित्र निर्माण होता है।”
इसके बाद विद्यालय की बहनों ने जैसे ही “वेलकम टू स्कूल” नृत्य पर थिरकना शुरू किया, पूरा परिसर तालियों से गूँज उठा। “माँ से ऊँचा जिनका है” गीत ने जहाँ मातृत्व को नमन किया, वहीं “प्यारे दादा जी हैं सबसे अनमोल” नृत्य पर कई बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों को गले लगाकर भावुक हो गए।
विद्यालय प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष मुख्य अतिथि श्री अर्जुन मिष्ठकार जी ने कहा, “जिस घर में बुजुर्ग हँसते हैं, वह घर मंदिर बन जाता है। सरस्वती शिशु विद्या मंदिर ने आज समाज को दिशा दिखाई है।” अभिभावक प्रतिनिधि श्री रमेश सिंह जी ने भावुक होकर कहा, मेरे पिता आज पहली बार मेरे बच्चे के विद्यालय में आए हैं। यह दिन मैं जीवन भर नहीं भूलूँगा।
समारोह का सबसे मार्मिक क्षण वह था जब सभी भैया-बहनों ने मंच पर अपने दादा-दादी, नाना-नानी के चरण धोकर, तिलक लगाकर पूजन किया और आशीर्वाद लिया। कई बुजुर्गों की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े।
एक दादी ने कहा, लगता है फिर से ब्याह के बाद विदाई हो रही है, इतना मान मिला। पूरे परिसर में ‘संस्कारों की गूँज’ साफ सुनी जा सकती थी।
श्रीमती पृथा सिन्हा जी ने धन्यवाद ज्ञापन में कहा कि यह आयोजन सिर्फ एक दिन का नहीं, बल्कि जीवन भर का संस्कार है। प्रधानाचार्य जी ने घोषणा की, “आज से हर भैया-बहन रोज सुबह अपने घर के बड़े – बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर ही विद्यालय आएंगे – यही शिशु विद्या मंदिर की असली शिक्षा है।
विद्यावान बनने से पहले संस्कारवान बनना जरूरी है – सरस्वती शिशु विद्या मंदिर बरगंडा ने आज यह सिद्ध कर दिया। यह समारोह नहीं, भारतीय परिवार व्यवस्था का पुनर्जागरण था।कार्यक्रम को सफल बनाने में सभी दीदी जी व आचार्य जी का सराहनीय योगदान रहा।

