सच अकेला भी काफ़ी है

तू सिखाकर गया—
कि सच अकेला भी खड़ा हो सकता है,
कि सवाल पूछना अपराध नहीं,
और उम्मीद—थककर भी नहीं टूटती।

तूने दिखाया
भ्रष्टाचारी रूप के
दीमक, उल्लू और अजगर के चेहरे,
पर साथ ही
आँखों में जलती वो चिंगारी भी
जो अँधेरे से डरती नहीं।

कुछ सपने अधूरे रहे,
कुछ लड़ाइयाँ लंबी हुईं,
पर हर गिरावट ने
खड़े होने का नया तरीक़ा सिखाया।

अलविदा 2025—
तेरे सबक़, तेरी चोटें,
तेरी सच्चाइयाँ—
सब साथ लेकर
हम आगे बढ़ते हैं।

नए साल से वादा है—
डर कम होगा,
सवाल तेज़ होंगे,
और न्याय की आवाज़
और ऊँची।

अलविदा… और स्वागत उस सुबह का,
जहाँ उम्मीद हार नहीं मानती।🌞🌳
आपका सभी का अपना
रामप्रवेश गुप्ता पत्रकार महुआडांड़