गायत्री शक्तिपीठ, कल्याणपुर में आयोजित रामकथा महोत्सव के तीसरे दिन बुधवार की शाम, गायत्री परिवार के वरिष्ठ वक्ता श्री विनोद पाठक
श्री पाठक ने बताया कि माघ मेले के दौरान सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही त्रिवेणी संगम पर देश भर के ऋषि समाज कल्याण हेतु इकट्ठा होते थे और वहां समाज की हर ज्वलंत समस्या पर महीनों विचार-विमर्श चलता था। यह परंपरा हमारे सांस्कृतिक इतिहास का गौरव है।
🌸 “होइहि सोई जो राम रचि राखा…”
कथा में सती के शरीर त्याग का मार्मिक प्रसंग सुनाते हुए श्री पाठक ने कहा कि “होइहि सोई जो राम रचि राखा” — यह चौपाई नियति की अटलता को दर्शाती है। चाहे मनुष्य हो या देवता, होनी को कोई टाल नहीं सकता। भगवान शिव ने स्वयं भवानी सती को यह समझाने का प्रयास किया था, किंतु नियति के आगे वे भी विवश थीं। कथा के इस भावुक प्रसंग में उपस्थित श्रोता भावविह्वल हो उठे।
गायत्री शक्तिपीठ, कल्याणपुर में आयोजित रामकथा महोत्सव के तीसरे दिन बुधवार की शाम, गायत्री परिवार के वरिष्ठ वक्ता श्री विनोद पाठक ने भावविभोर कर देने वाली रामकथा प्रस्तुत की। उन्होंने कथा का आरंभ प्रयागराज में याज्ञवल्क्य ऋषि और भारद्वाज ऋषि के ऐतिहासिक संवाद से किया, जिसमें ऋषियों द्वारा समाज की समस्याओं पर विमर्श और समाधान की पौराणिक परंपरा का वर्णन किया गया।
श्री पाठक ने बताया कि माघ मेले के दौरान सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही त्रिवेणी संगम पर देश भर के ऋषि समाज कल्याण हेतु इकट्ठा होते थे और वहां समाज की हर ज्वलंत समस्या पर महीनों विचार-विमर्श चलता था। यह परंपरा हमारे सांस्कृतिक इतिहास का गौरव है।
🌸 “होइहि सोई जो राम रचि राखा…”
कथा में सती के शरीर त्याग का मार्मिक प्रसंग सुनाते हुए श्री पाठक ने कहा कि “होइहि सोई जो राम रचि राखा” — यह चौपाई नियति की अटलता को दर्शाती है। चाहे मनुष्य हो या देवता, होनी को कोई टाल नहीं सकता। भगवान शिव ने स्वयं भवानी सती को यह समझाने का प्रयास किया था, किंतु नियति के आगे वे भी विवश थीं। कथा के इस भावुक प्रसंग में उपस्थित श्रोता भावविह्वल हो उठे।




