“मेदिनीनगर टाउन थाना में वकीलों की बर्बर पिटाई : डी.के. बसु गाइडलाइन और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन”

विषय : मेदिनीनगर टाऊन थाने के बाहर और लॉकअप में वकील अभिषेक रंजन, वकील सुधांशु बिरंची और विवेक कुमार की बर्बर पिटाई और सुप्रीम कोर्ट द्वारा डीके बसु 1997 में जारी गाइड लाइन और मौलिक संवैधानिक अधिकारों के हनन के संबंध में।

महाशय,
उपरोक्त संदर्भ में निवेदन के साथ कहना है कि

  1. विगत 12 अगस्त की शाम को, कानूनों का उल्लंघन करते हुए थाने के बाहर और खास कर थाने के अंदर, एडवोकेट अभिषेक रंजन, एडवोकेट सुधांशु नारायण बिरांची, और विवेक कुमार, के साथ अमानवीय तरीके से मारपीट हुई है। इस बर्बर पिटाई में शामिल सभी होम गार्ड, एएसआई शशिरंजन पांडे जिन्होंने अभिषेक रंजन के सर पर हमला किया, उन सबको अविलंब निलंबित कर उनपर FIR दर्ज किया जाए। अभिषेक रंजन और सुधांशु द्वारा यह बताने के बाद भी को वो वकील हैं, टाऊन थाना प्रभारी की उपस्थिति में थाने के अंदर उनके साथ जानलेवा मारपीट हुई है। थाना प्रभारी को निलंबित किया जाए।
  2. ASI शशिरंजन पांडे के निर्देश पर होमगार्ड पवन कुमार पिता जयप्रकाश बैठा द्वारा, अभिषेक रंजन, सुधांशु नारायण, विवेक कुमार, और दिव्या भगत पर मुकदमा(FIR No 355/2025), टाऊन थाना मेदिनीनगर में किया गया है। जिसमें एस सी और एस टी एक्ट 1989 लगाया गया है, जबकि FIR में नामित विवेक कुमार(भुइयां जाति) और दिव्या भगत(रविदास जाति) खुद अनुसूचित जाति से आते हैं। झूठा केस बना, दबाव बनाया जा रहा है ताकि मारपीट करने वाले पुलिसकर्मियों पर करवाई न हो।
  3. एडवोकेट अभिषेक रंजन के कंप्लेंट पर अभी तक FIR रजिस्टर्ड नहीं हुआ है। एडवोकेट सुधांशु ने ऑनलाइन FIR किया है। फिर भी अभी तक टाऊन थाना प्रभारी ज्योतिलाल रजवार ने उनका FIR रजिस्टर्ड नहीं किया है। थाना मार पीट के केस को दबा देना चाहती है, उच्चतर अधिकारियों के सुपरविजन में केस की जांच हो।
  4. पलामू में पिछले महीनों में नावाबाजार में थाने में बर्बरतापूर्ण पिटाई की वजह से महफूज नामक व्यक्ति की मौत हुई। मेदिनीनगर शहर के कुंदन कुमार पांडे की मौत भी थाने में और जेल में मारपीट की वजह से हुई। इन घटनाओं के जिम्मेवार अधिकारियों पर करवाई नहीं होना, पुलिस को और बर्बर होने के लिए बढ़ावा देता है। एडवोकेट अभिषेक रंजन, एडवोकेट सुधांशु और विवेक कुमार से थाने में मारपीट के घटना की जानकारी व्हाट्सएप के माध्यम से पलामू एसपी को दी जाती है। तब एसपी पलामू घटना पर करवाई की बात करना तो दूर, पूछती हैं कि “आप क्यों चिंतित हैं? जब जिसे चोट आई है उन्हें कोई दिक्कत नहीं है।” यह पलामू पुलिस कप्तान की संवेदनहीनता ही नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति निराशाजनक रवैया भी दर्शाता है।क्या एसपी के इसी रवैए की वजह से थानों के अधिकारी डीके बसु 1997 की गाइडलाइंस को, दिवाल सुशोभित करने वाली रंगोली की तरह इस्तेमाल करते हैं? यह अतिचिंतनीय विषय है।

महोदय आपसे निवेदन है कि अभिषेक रंजन, सुधांशु, विवेक कुमार के साथ मारपीट करने वाले अधिकारियों पर अविलंब कारवाई कर, पुलिस के प्रति जनता के विश्वास को बहाल करें।