“चार कंधों पर जिंदगी और मौत: 10 किमी दूर सड़कहीन लालमाटी की दर्दनाक कहानी”

चार कंधों पर जिंदगी की जंग, चार कंधों पर अंतिम विदाई10 किलोमीटर दूर लालमाटी गांव आज भी सड़क से वंचित,अस्पताल पहुंचने से पहले तोड़ा दम; शव भी खाट पर लाना पड़ा
गुमला – झारखंड के गुमला जिले के रायडीह प्रखंड स्थित लालमाटी गांव में आज भी सड़क नहीं है। मुख्य मार्ग से करीब 10 किलोमीटर दूर बसे इस गांव तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को पगडंडियों, पहाड़ी और उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। यहां एंबुलेंस और वाहन केवल नाम के हैं, असल सहारा आज भी ग्रामीणों के कंधे ही हैं।
शनिवार को 48 वर्षीय भीमसाई मुंडा की दर्दनाक कहानी ने इस हकीकत को एक बार फिर उजागर कर दिया। तबीयत बिगड़ने पर गांव के चार ग्रामीणों ने उन्हें खाट पर लिटाया और कंधे पर उठाकर करीब 10 किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया। वहां से उन्हें गुमला सदर अस्पताल ले जाया गया।
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में इलाज मिलने में देरी हुई। लगातार हालत बिगड़ती गई और अंततः सदर अस्पताल में ही भीमसाई मुंडा ने दम तोड़ दिया।
दर्द यहीं खत्म नहीं हुआ। मौत के बाद भी उन्हें सम्मानजनक तरीके से घर नहीं पहुंचाया जा सका। एंबुलेंस शव को केवल मुख्य मार्ग तक ही ला सकी। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण वाहन आगे नहीं बढ़ सका और वापस लौट गया। इसके बाद एक बार फिर चार कंधों ने जिम्मेदारी संभाली। खाट पर शव रखकर ग्रामीणों ने पथरीले, पहाड़ी और कठिन रास्तों से 10 किलोमीटर पैदल चलकर उसे गांव पहुंचाया।
ग्रामीणों का कहना है कि लालमाटी गांव में आज भी एंबुलेंस का मतलब कंधे हैं। चाहे कोई गंभीर रूप से बीमार हो या किसी की मौत हो जाए, अस्पताल तक पहुंचाने और वापस लाने का एकमात्र साधन खाट ही है।
करीब 150 की आबादी वाले इस गांव में अधिकतर आदिवासी परिवार रहते हैं। बरसात के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। कई बार गर्भवती महिलाओं को भी बहंगी के सहारे अस्पताल ले जाना पड़ता है, जिससे उनकी और शिशु की जान पर खतरा बना रहता है।
ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि जब सरकार गांव-गांव सड़क और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने का दावा करती है, तो लालमाटी गांव तक सड़क आखिर कब पहुंचेगी?
भीमसाई मुंडा की जिंदगी और मौत का यह सफर केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है, जहां आज भी 10 किलोमीटर की दूरी चार कंधों पर तय करनी पड़ती है। यह घटना ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और सरकारी दावों की वास्तविकता को उजागर करती है।