गिरिडीह में करमा पर्व की धूम, भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना को रखा उपवास
गिरिडीह। भाई-बहन के अटूट प्रेम, सुख-समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली के प्रतीक करमा पर्व की धूम गिरिडीह जिलेभर में देखने को मिली। जिला मुख्यालय से लेकर दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक बहनों ने निर्जला उपवास रखकर करम डाली की विधि-विधान से पूजा की। शाम ढलते ही पूजा स्थलों पर करमा गीतों और मांदर-ढोल की थाप के साथ सामूहिक नृत्य का दौर देर रात तक चलता रहा। करमा पर्व भादो शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है और इसमें भाई की लंबी आयु, सुख-समृद्धि तथा अच्छी फसल की कामना की जाती है।
पर्व के दिन बहनों ने अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना के साथ उपवास रखा। शाम को करम डाली की स्थापना कर पूजा-अर्चना की गई। पूजा के दौरान बहनों ने करम डाली में धागा बांधा और भाई के उज्ज्वल भविष्य व परिवार की खुशहाली की प्रार्थना की।
गांवों में पर्व से पहले ही तैयारियां शुरू हो गई थीं। बहनों और युवतियों ने करम डाली की व्यवस्था की तथा शाम को पूजा स्थल को सजाया। पूजा के बाद सभी महिलाएं और युवतियां करम डाली के चारों ओर बैठकर पारंपरिक रीति से आराधना करती रहीं।
पूजा-अर्चना के बाद करमा गीत और नृत्य का उत्सव शुरू हुआ। महिलाओं और युवतियों ने पारंपरिक गीत गाते हुए करम डाली के चारों ओर नृत्य किया। ढोल, मांदर और अन्य देसी वाद्यों की थाप पर युवाओं के साथ महिलाएं भी जमकर थिरकीं। कई स्थानों पर देर रात तक करमा गीतों की महफिल सजी रही।
करमा गीतों में प्रकृति, भाई-बहन के प्रेम, पारिवारिक रिश्तों और ग्रामीण जीवन की झलक साफ झलकती रही। बच्चों और युवाओं में भी पर्व को लेकर खास उत्साह देखा गया। कई जगह नई पीढ़ी के युवक-युवतियों ने बुजुर्गों से करमा पर्व की परंपरा और उसके महत्व के बारे में जानकारी ली।
झारखंड की लोक संस्कृति में करमा पर्व का विशेष स्थान है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति पूजा, कृषि, सामूहिकता और परंपरा का भी उत्सव है। करम वृक्ष को उर्वरता, समृद्धि और शुभता से जोड़ा जाता है, इसलिए इस पर्व में अच्छी फसल और धरती की खुशहाली की कामना भी की जाती है।
आधुनिकता के दौर में जहां कई रीति-रिवाज बदल रहे हैं, वहीं करमा पर्व आज भी गांव-गांव में पुराने उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। गिरिडीह के ग्रामीण क्षेत्रों में इसे लोक संस्कृति, सामूहिकता और भाई-बहन के प्रेम के जीवंत उत्सव के रूप में देखा गया।
परंपरा के अनुसार पूजा के बाद अगले दिन करम डाली का नदी या जलाशय में विसर्जन किया जाएगा। इसके बाद बहनें अपना उपवास तोड़ेंगी और परिवार के सदस्यों के साथ प्रसाद ग्रहण करेंगी। मान्यता है कि करमा पूजा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है तथा भाई-बहन का रिश्ता और मजबूत होता है।

