न्याय की आस में भटक रही इटखोरी प्रखंड की सहायिका लीला सिन्हा, अब सीडीपीओ की कार्यशैली पर भी उठे सवाल
न्याय की आस में भटक रही इटखोरी प्रखंड की सहायिका लीला सिन्हा, अब सीडीपीओ की कार्यशैली पर भी उठे सवाल
ड्यूटी बहाली को लेकर 6 दिन बाद उपायुक्त से फिर लगाई गुहार, कुछ आंगनबाड़ी कर्मियों ने भी नाम गोपनीय रखने की शर्त पर विकास मद की राशि, वार्षिक वृद्धि और खरीद प्रक्रिया को लेकर उठाए प्रश्न
इटखोरी (चतरा)। इटखोरी प्रखंड के आंगनबाड़ी केंद्र रजवार की सहायिका लीला सिन्हा का मामला अब केवल ड्यूटी बहाली तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि महिला एवं बाल विकास विभाग तथा सीडीपीओ कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई सवाल खड़े होने लगे हैं। जनता दरबार में आवेदन देने के पांच दिन बाद भी मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने पर पीड़िता ने एक बार फिर उपायुक्त रवि आनंद एवं विभाग के उच्चाधिकारियों से हस्तक्षेप कर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
लीला सिन्हा का कहना है कि वह लगातार अधिकारियों के कार्यालयों का चक्कर लगा रही हैं, लेकिन उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। उनका आरोप है कि बिना स्पष्ट जांच और लिखित आदेश के उन्हें ड्यूटी से दूर रखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि उनकी उम्र को लेकर विभाग को कोई आपत्ति है तो उनके सभी दस्तावेजों की जांच कराई जाए और सच्चाई सामने लाई जाए।
पीड़िता का दावा है कि नियुक्ति के समय जमा किए गए शैक्षणिक प्रमाणपत्र के अनुसार उनकी सेवा अवधि अभी शेष है। इसके बावजूद उन्हें यह कहकर ड्यूटी से रोका जा रहा है कि उनकी उम्र सेवा सीमा पार कर चुकी है। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर उन्हें न्याय दिलाया जाए।
सीडीपीओ की कार्यप्रणाली को लेकर भी उठने लगे सवाल:
मामले के बीच कुछ आंगनबाड़ी कर्मियों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं। कर्मियों का आरोप है कि आंगनबाड़ी केंद्रों के विकास एवं आवश्यक सामग्री की खरीद के लिए आने वाली राशि के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कुछ कर्मियों ने दावा किया कि वेतन वृद्धि के तहत प्रतिवर्ष मिलने वाली अतिरिक्त राशि के संबंध में भी कई प्रकार की शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका आरोप है कि कुछ मामलों में क्लस्टर स्तर पर नगद राशि की मांग की जाती है और हमें मजबूरन देना भी पड़ता है। वहीं यह भी आरोप लगाया गया कि आंगनबाड़ी केंद्रों के विकास हेतु प्राप्त राशि के उपयोग को लेकर कई प्रकार की मौखिक अपेक्षाएं रखी जाती हैं।
कर्मियों का यह भी दावा है कि कई बार केंद्रों के लिए सामग्री उपलब्ध करा दी जाती है और बाद में सेविका के खाते में विकास के तहत आई राशि निकालकर देने की बात कही जाती है। उनका कहना है कि विकास कार्यों के लिए मिलने वाली राशि के उपयोग को लेकर स्पष्टता और पारदर्शिता आवश्यक है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
सूत्रों के अनुसार, कुछ कर्मियों ने यह भी मांग उठाई है कि आंगनबाड़ी केंद्रों में विकास मद, सामग्री खरीद, वार्षिक वृद्धि राशि तथा अन्य वित्तीय मदों की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए, ताकि सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो सके और वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
जांच से ही सामने आएगी सच्चाई:
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी को सेवानिवृत्त घोषित किया जाता है तो उसे समय पर स्पष्ट लिखित आदेश उपलब्ध कराया जाना चाहिए। वहीं यदि विभाग के विरुद्ध लगाए जा रहे आरोपों में सच्चाई है तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
लीला सिन्हा ने कहा कि वह अब भी जिला प्रशासन पर भरोसा रखती हैं और उम्मीद करती हैं कि उपायुक्त स्वयं मामले का संज्ञान लेकर दस्तावेजों की जांच कराएंगे तथा जो भी सत्य होगा, उसके आधार पर उचित निर्णय लिया जाएगा।
अब उठ रहे हैं कई अहम सवाल:
यदि सहायिका की सेवा अवधि समाप्त हो चुकी है तो अब तक स्पष्ट लिखित आदेश क्यों नहीं दिया गया?
दस्तावेजों को लेकर विवाद है तो निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जा रही?
विकास मद एवं सामग्री खरीद को लेकर उठ रहे सवालों की जांच कौन करेगा?
क्या विभागीय स्तर पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र जांच समिति गठित की जाएगी?
फिलहाल पूरा मामला इटखोरी प्रखंड में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि पीड़ित सहायिका की गुहार और सीडीपीओ की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों पर कब और किस स्तर पर कार्रवाई होती है।

