मोदी सरकार अति कर रहा है, इनका अब अंत होगा-निशांत

मोदी सरकार अति कर रहा है, इनका अब अंत होगा-निशांत

गढ़वा से आज माननीय राष्ट्रपति महोदया, भारत गणराज्य को एक त्राहिमाम पत्र  प्रेषित किया गया है, जिसे उपायुक्त महोदय, गढ़वा के माध्यम से भेजा गया। इस पत्र में ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ के कारण उच्च शिक्षा में अध्ययनरत एवं प्रवेश की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाले गंभीर प्रतिकूल प्रभाव  को रेखांकित किया गया है। निशांत चतुर्वेदी ने इस बारे मे बताते हुए कहा की त्राहिमाम पत्र में रेगुलेशन समान अवसर सामाजिक न्याय और शैक्षणिक समावेशन  की भावना के विपरीत है। इससे न केवल वंचित और मध्यम वर्गीय छात्रों की शिक्षा तक पहुँच प्रभावित होगी, बल्कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के कैम्पस में जातिगत भेदभाव असमानता तथा तनाव  बढ़ने की प्रबल आशंका है। ऐसे हालात भविष्य में कैम्पस हिंसा और सामाजिक टकराव  को भी जन्म दे सकते हैं, जो देश के शैक्षणिक वातावरण के लिए अत्यंत घातक होगा।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि शिक्षा केवल नीति या आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि देश के भविष्य और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा संवेदनशील प्रश्न है। यदि समय रहते इस रेगुलेशन पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो इसके दूरगामी दुष्परिणाम छात्रों, शिक्षण संस्थानों और समाज—तीनों पर पड़ेंगे।आज छात्रो ने माननीय राष्ट्रपति महोदया से आग्रह किया है कि वे इस विषय में हस्तक्षेप कर प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस की समीक्षा और स्थगन  हेतु केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं को निर्देश दें, ताकि उच्च शिक्षा में न्याय समानता और शांती बनी रहे।
शुभेन्द्र दुबे ने कहा की ये रेगुलेशंस ऑफ इक्विटी नहीं डेमोलिशन ऑफ एजुकेशन एंड डेमोलिशन ऑफ इंस्टीट्यूशन है यह रेगुलेशन रोलेक्ट एक्ट का जुड़वा भाई है जिसके जरिए समाज के एक वर्ग को इंस्टीट्यूशन से बाहर करने का प्रयास किया जा रहा है एक तरफा कार्रवाई विश्वविद्यालय में ही नहीं समाज में भी जातीय हिंसा को बढ़ावा देगा तथा सवर्ण समाज के लोग ही नहीं पिछड़े समाज के लोगों पर गलत आरोप लगा कर उन्हें मानसिक आर्थिक रूप से परेशान किया जा सकता है तथा विश्विद्यालय प्रशासन खुले आम बहुत सारे स्टूडेंट्स को ब्लैक मेल कर सकता है ऐसी स्थिती में स्टूडेंट्स का पढ़ाई रुक जाएगा तथा आधा जीवन उनका विश्विद्यालय प्रशासन से लड़ने में बीत जाएगा। इस रेगुलेशन के रूल प्राकृतिक न्याय एवं संविधान दोनो के विपरीत है इस काले रेगुलेशन को जल्द से जल्द वापस लिया जाए वरना स्टूडेंट्स के पास रोड के अलावा कोई विकल्प नहीं है
अंत में यह स्पष्ट किया गया कि यदि छात्रों की आवाज़ को अनसुना किया गया, तो लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से व्यापक आंदोलन  के लिए छात्र विवश होंगे।