महाराज नहुष महान् तेजस्वी, यशस्वी, धर्मिष्ठ और दानी थे।
नहुष ने एक दिन इन्द्राणी को देखा तो उनका चित्त दूषित हो गया और उन्होंने आज्ञा दी कि शची देवी आज मेरे महल में शीघ्र पधारें। इन्द्राणी भयभीत तथा चिन्तातुर हो गयीं, वे अपने स्वामी तथा इन्द्र का पता लगाकर उनके पास गयीं और सब वृत्तान्त कह सुनाया तथा पातिव्रत्य की रक्षा चाही। इन्द्र ने यह उपाय बताया कि तुम एकान्त में नहुष से मिलकर कहो कि तुम मुझसे मिलने के लिये ऋषीश्वरों की दिव्य सवारी पर चढ़कर आओ। तब मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे अधीन हो जाऊँगी। शची ने ऐसा ही किया। नहुष सहर्ष तैयार हो गये और देवर्षियों तथा महर्षियों से पालकी उठवाकर इन्द्राणी के पास चले। नहुष ‘सर्प-सर्प’ अर्थात् ‘जल्दी चलो-जल्दी चलो’ इस प्रकार कहकर ऋषियों को शासित कर रहा था। परंतु पालकी ढोने के अनभ्यस्त ऋषिगण धीरे-धीरे ही चल रहे थे। क्रोधान्ध हो नहुष ने श्रीअगस्त्य जी के सिरपर लात चलायी। श्रीअगस्त्यजी ने शाप दे दिया कि तूने अधर्म से व्याप्त होकर मेरे सिर में पैरकी ठोकर मारी, अतः तू हततेज होकर पृथ्वी पर गिर और दस हजार वर्षतक अजगर बना रहे। नहुष का काम का नशा उतर गया और अत्यन्त दीन होकर मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी से प्रार्थना की कि प्रभो, मेरे शापका अन्त नियत कर दीजिये। तब श्रीअगस्त्यजी ने कहा कि जो तुम्हारे पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर दे दे, वही तुम्हें शापसे छुड़ा सकता है। राजन्, जिसे तुम पकड़ लोगे, वह बलवान से भी बलवान् क्यों न हों, उसका भी धैर्य छूट जायगा। तत्पश्चात् राजा नहुष अजगर होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।
जब पाण्डव जुए में हारकर वनवास कर रहे थे। उस समय द्वैतवन में एक दिन भीमसेन नहुष (अजगर) की पकड़ में आ गये। लाख प्रयत्न करने पर भी महाबली भीम अपने को छुड़ाने में जब समर्थ नहीं हो सके, तब उनको खोजते-खोजते धर्मराज युधिष्ठिर जी वहाँ पहुँचे। श्रीधर्मराज ने अजगर से भीम को छोड़ देने के लिये बहुत प्रार्थना की। अजगर ने कहा-यदि तुम मेरे पूछे हुए कुछ प्रश्नों का अभी उत्तर दे दोगे तो मैं तुम्हारे भाई को छोड़ दूँगा। श्रीयुधिष्ठिरजी की अनुमति पाकर अजगर ने पूछा- राजन्, यह बताओ कि ब्राह्मण कौन है ? जानने योग्य तत्त्व क्या है ? श्रीयुधिष्ठिरजी ने कहा- नागराज, जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रौर्याभाव, तपस्या और दया ये सद्गुण दिखायी देते हों, वही ब्राह्मण कहा गया है तथा जानने योग्य तत्त्व तो परब्रह्म ही कहा गया है। अजगर ने कहा- ‘युधिष्ठिर, तुम जानने योग्य सभी बातें जानते हो। तुम्हारे शुभागमन से मेरे लिये यह महान् पुण्यकाल उपस्थित हो गया है, अब इस घोर तमोमयी योनि से मेरा उद्धार हो गया है।’ यह कहते हुए राजा नहुषने अजगरका शरीर त्याग दिया और वे दिव्य शरीर धारण करके स्वर्गलोक को चले गये।
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